रेणुकूट। हिंडाल्को प्रबंधन द्वारा रेणुकेश्वर महादेव मंदिर, रेणुकूट में हो रहे सप्तदिवसीय रामकथा के तीसरे दिन कथा व्यास पं. नाना लालजी राजगुरु ने वन में श्री राम, लक्ष्मण से श्री हनुमानज के मिलन के प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि सुग्रीव बाली के भय से ऋष्यामूक पर्वत पर वास कर रहे थे। जब श्री रामजी का आगमन होता है तब सशस्त्र रामजी को देख कर सुग्रीव के मन में भ्रम होता है, कही बाली ने तो इन्हें नहीं भेजा। भ्रम दूर करने के लिए हनुमान से कहा कि ब्रह्मचारी का रूप धारण करके ये कौन हैं। यथार्थ जानकर संकेत करना, यदि शत्रु द्वारा भेजे गए हों तो तुरंत मैं पर्वत छोड़ कर भाग जाऊंगा। हनुमान अखंड ज्ञान युक्त होने के कारण श्री रामजी को सांसारिक वेश में भी पहचान जाते हैं और उनके चरणों में सिर रख कर प्रणाम करते हैं। श्री राम के परिचय पूछने पर हनुमान ने कहा कि वे उनके सेवक है और साथ ही हनुमान ने श्री राम से पूछा कि आप भगवान होकर मनुष्य की भांति क्यों मेरा परिचय पूछ रहे हैं। मनुष्य मायावश ईश्वर को भूला रहता है, लेकिन ईश्वर अपने भक्त को कभी नही भूलते। कारण कि भक्त जब भगवान की शरण में होता है तब उसकी भौतिक उपलब्धियां विलुप्त हो जाती हैं और उसका कोई अलग अस्तित्व नहीं रहता, वह ईश्वरमय हो जाता है। सुग्रीव का भ्रम श्री हनुमान श्री राम से मित्रता करवाकर दूर करते हैं तथा उनके शत्रु बालि का वध करके श्री राम उन्हें अखंड भक्ति प्रदान करते हैं। कथा से पूर्व हिंडाल्को रिडक्शन प्लांट प्रमुख डॉ. जगपाल सिंह ने श्री रामायण पूजन कर एवं पंडितजी का टीका कर तीसरे दिन की रामकथा का शुभारंभ कराया।