सीतापुर। ग्राम्य विकास विभाग के अफसरों के कारनामे गजब के हैं। पहले तो नियमों को धता बताकर प्रशासनिक मद का बजट टाइल्स (नाम पट्टिकाएं) खरीदने में इस्तेमाल कर लिया। फिर बंद पंचायत उद्योग से टाइल्स की खरीद दिखा दी। 304 रुपये प्रति टाइल के आश्चर्यचकित करने वाले मूल्य पर खरीद का दावा हुआ। उस पर भी टाइल्स का इस्तेमाल हुआ ही नहीं। गोंदलामऊ ब्लॉक कार्यालय के शौचालय में बड़ी संख्या में टाइल्स रखे हुए हैं।
अमर उजाला ने मंगलवार को खुलासा किया था कि मछरेहटा ब्लाॅक मुख्यालय में बड़ी संख्या में टाइल्स रखे हुए हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण की गिनती केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में की जाती है। वर्ष 2019-20 में योजना के तहत लाभार्थियों के आवास के बाहर नाम पट्टिकाएं लगवाने का निर्णय किया गया था।
बाद में यह निर्णय हुआ था कि लाभार्थियों के आवास के बाहर उनका नाम पता आदि पेंट से लिखवाया जाए। बावजूद इसके वर्ष 2019 में जिले में ग्राम्य विकास विभाग में तैनात अफसरों ने प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के प्रशासनिक मद से खरीद करने का निर्णय कर लिया। नाम पट्टिकाएं बनवाने के लिए टाइल्स खरीदे गए। इन टाइल्स की खरीद खैराबाद पंचायत उद्योग से की गई, जहां लंबे समय से टाइल्स बनाने का काम ही नहीं हुआ।
खरीदे गए टाइल्स प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभार्थियों के मकानों में लगाए जाने का दावा किया गया, लेकिन हकीकत में इन्हें इस्तेमाल में ही नहीं लाया गया। खरीदे गए टाइल्स अब भी बड़ी संख्या में जहां-तहां पड़े हैं। मंगलवार के अंक में अमर उजाला ने खुलासा किया था कि मछरेहटा विकासखंड मुख्यालय के कार्यालय परिसर में स्थित एक कमरे में बड़ी संख्या में टाइल्स रखे हैं।
अब इसी क्रम में पता चला है कि गोंदलामऊ ब्लॉक मुख्यालय में स्थित एक शौचालय में भी बड़ी संख्या में टाइल्स रखे हैं। शौचालय ग्राम सचिव के ब्लॉक मुख्यालय स्थित कार्यालय में है। खास बात यह है कि ब्लॉक मुख्यालय का निरीक्षण लगातार कोई न कोई अधिकारी करता ही रहता है। इसके अलावा ब्लाॅक प्रमुख का भी कार्यालय आना जाना रहता है। शौचालय में बंद पड़े इन टाइल्स की जानकारी ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों और कर्मचारियों ने किसी को होने ही नहीं दी।
खुलता जा रहा खेल, अफसरों की आंखें बंद
टाइल्स खरीद के नाम पर हुए लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपये के खेल में हर रोज नए खुलासे हो रहे हैं। बावजूद इसके जनपद के आला अधिकारियों के साथ विभागीय उच्चाधिकारियों की भी आंखें बंद हैं। शायद यही वजह है कि अभी तक जिले के आला अधिकारी इस पूरे मामले की जांच कराने को लेकर कोई निर्णय नहीं ले पाए हैं। टाइल्स खरीद से जुड़ी पत्रावली तक देखने की फुर्सत अभी अफसरों को नहीं मिली है। यह बात और है कि ग्राम्य विकास अभिकरण के परियोजना निदेशक गजेंद्र प्रताप सिंह दावा करते हैं कि कार्यालय में इससे जुड़ी फाइल है ही नहीं।
लगने नहीं थे टाइल्स फिर भी हुई खरीद
टाइल्स खरीदने वाले अफसरों को बचाने की कवायद भले ही जिम्मेदार कर रहे हों लेकिन पूरा खेल बिल्कुल स्पष्ट है। अगर टाइल्स किसी भी लाभार्थी के यहां लगाए ही नहीं जाने थे तो फिर इनकी खरीद पर साढ़े तीन करोड़ रुपये खर्च करने की वजह हर कोई आसानी से समझ सकता है। इतना ही नहीं जो टाइल्स खरीदे गए हैं उनकी मौजूदा कीमत मुश्किल से 60 रुपये प्रति पीस होगी, जबकि तीन साल पहले इन्हें 304 रुपये प्रति पीस के हिसाब से खरीदा गया था। पूरा खेल समझना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं है।