नैमिषारण्य (सीतापुर)। कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं। इस दिन चातुर्मास का समापन होता है। चार नवंबर को भगवान श्रीहरि विष्णु चार माह की योग निद्रा से बाहर आएंगे। वैवाहिक कार्यक्रम 21 नवंबर से शुरू हो जाएंगे।
आचार्य सदानन्द दिवेदी ने बताया कि देवश्यनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं, जिसे चतुर्मास भी कहते हैं। इस दिन से सभी शुभ मांगलिक कार्य बंद हो जाते हैं। फिर देवउठनी एकादशी को भगवान नारायण योग निद्रा से जागते हैं। इस दिन से सभी मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। मगर इस बार शुक्र अस्त होने की वजह से देवउठनी एकादशी से वैवाहिक कार्यों की शुरुआत नहीं होगी। शुक्र 20 नवंबर को उदय होगा। इस कारण नवंबर में शुभ वैवाहिक लग्न 21, 24, 25, 26 व 27 को होंगे।
आचार्य रमेश चन्द्र शास्त्री ने बताया कि इस दिन तुलसी और शालिग्राम के साथ विवाह उत्सव मनाया जाता है। संध्याकाल में महिलाएं विधि विधान से तुलसी शालिग्राम का विवाह कराती हैं। शास्त्रों के अनुसार जिन दंपतियों के कन्या नहीं होती, वह तुलसी का विवाह करके कन्यादान कर पुण्य प्राप्त करते हैं।
चार नवंबर को रखा जाएगा व्रत
देवउठनी एकादशी तीन नवंबर को शाम 7:30 बजे शुरू होगी। एकादशी तिथि का समापन चार नवंबर, शुक्रवार शाम 6:08 पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के आधार पर देवउठनी एकादशी व्रत चार नवंबर को रखा जाएगा।
पूजा का मुहूर्त
देवउठनी एकादशी का पूजा मुहूर्त चार नवंबर को सुबह 6:35 बजे से सुुबह 10:42 बजे के मध्य है। लाभ उन्नति मुहूर्त सुबह 7:57 बजे से सुबह 9:20 बजे इतक है। अमृत सर्वोत्तम मुहूर्त सुबह 9:20 बजे से सुबह 10:42 बजे तक रहेगा।
आठ नवंबर को चंद्र ग्रहण
आचार्य रमेश चंद्र शास्त्री ने बताया कि आठ नवंबर कार्तिक पूर्णिमा को ग्रस्तोदित चंद्रग्रहण होगा। चंद्रग्रहण 1:32 बजे मध्याह्न पर प्रारंभ होगा। जिसका मोक्ष शाम 6:19 बजे होगा। भारत में चन्द्रमा शाम 5 बजकर 9 मिनट पर उदय होगा।