नैमिषारण्य में एक अनूठी परंपरा देखने को मिली। इस परंपरा ने सभ्य समाज को सामाजिक मूल्यों के लिए सोचने को मजबूर कर दिया। वृद्धाश्रम के पांच बुजुर्गों ने जीवित रहते हुए अपना खुद ही पिंडदान व श्राद्ध किया। इनको चिंता थी कि जब जीते ही अपनों ने ठुकरा दिया तो मरने के बाद मेरा श्राद्ध कौन करेगा। बुजुर्गों की इस रीति रिवाज की शुक्रवार को दिनभर चर्चाएं होती रहीं।
सनातन मान्यता के अनुसार पितृपक्ष में नाभि गया के रूप में विख्यात नैमिषारण्य तीर्थ में पितरों के लिए किया गया पितृ कर्म कई गुना अधिक पुण्य प्रदान करता है। इसी विश्वास के चलते नैमिष तीर्थ में पूरे पितृपक्ष के 15 दिनों में देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां आकर अपने पितरों की स्मृति में पितृ कर्म करते हैं। वहीं आज के समय में कई बुजुर्ग ऐसे भी हैं, जिनके परिजनों ने ही उन्हें ठुकरा दिया है।
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तीर्थ स्थित एक वृद्धाश्रम में 84 बुजुर्ग निवास कर रहे है, जिनमें 35 महिलाएं और 49 पुरुष हैं। यह लोग अपने जीवन के अंतिम पलों को गुजार रहे हैं। इनका कहना है कि जब जीते जी कोई पुरसाहाल लेने वाला नहीं है तो मरने के बाद मेरा पिंडदान व श्राद्ध कौन करेगा। इसकी चिंता बुजुर्गों को सता रही थी। ऐसे में उन्होंने पहले पंडितों से राय ली।
उसके बाद खुद ही अपना पिंडदान करने की ठान ली। शुक्रवार को पांच बुजुर्गों ने चक्रतीर्थ परिसर पर अपनी मुक्ति के लिए अपना पिंडदान व श्राद्ध किया। यह नजारा बड़ा ही मार्मिक था। करीब दो घंटे तक चले इस कार्यक्रम में सभी बुजुर्गों ने बड़े ही श्रद्धाभाव से धार्मिक आयोजन में प्रतिभाग किया और अपने पितरों को पिंड व श्राद्ध अर्पित करते हुए स्वयं के लिए भी पिंडदान किया।
नहीं है कोई सहारा देने वाला
रामकुमार का कहना है कि मुझे सहारा देने वाला कोई नहीं है। इसलिए मैंने अपनी मुक्ति के लिए आज पिंडदान व श्राद्ध किया है।
मुक्ति प्रदान करना
रामरानी ने बताया कि हमने अपनी मुक्ति के लिए जीवित रहते ही पिंडदान किया और भगवान से प्रार्थना की। जब भी मेरी मौत हो जाए तो मुझे मुक्ति प्रदान करना।
नहीं मिला सहारा
अजय कुमार का कहना है कि पितृपक्ष में नाभि गया में मैंने अपना पिंडदान कर दिया है। क्योंकि जब जीते जी अपनों ने मुझे सहारा नहीं दिया तो मरने के बाद मेरा पिंडदान कौन करेगा।
जिसका कोई नहीं, वह कर सकता है पिंडदान
पुरोहित लक्ष्मी नारायण ने बताया कि लोग यहां अपने माता-पिता और अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए पिंड व श्राद्ध करने के लिए आते हैं। मगर पहली बार हमारे द्वारा जीवित लोगों को खुद मुक्ति के लिए पिंड दान कराया गया है। शास्त्री ने कहा कि धार्मिक मान्यता के अनुसार जिस व्यक्ति का कोई नहीं होता है। वह अपने जीवन के अंतिम काल में अपना पिंडदान कर सकता है। जिससे वृद्ध आश्रम में निवास कर रहे वृद्धों ने खुद ही पिंडदान किया है।