नैमिषारण्य/सीतापुर। देश के जिन तीन स्थानों पर गया पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म किया जाता है, उनमें नैमिष का काशी कुंड भी शामिल है। यह नाभि गया के नाम से विख्यात है। काशीकुंड में श्राद्ध के दौरान पिंड दान कर स्नान किया जाता है। पितृपक्ष 29 सितंबर से शुरू हो रहे हैं लेकिन काशी कुंड अभी तक उपेक्षित है। इसका जल स्नान तो दूर आचमन करने लायक भी नहीं है। ऐसे में यहां श्राद्ध के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।
नैमिषारण्य का काशीकुंड चक्रतीर्थ से पूर्व दिशा में स्थित है। प्राकृतिक सौंदर्य के मध्य यह शांत व पौराणिक तीर्थ है। मान्यता है, कि जब तक मनुष्य इस स्थान पर पिंडदान नहीं करता है तब तक उसके पितृ तृप्त नहीं होते हैं।
अत: पितृों की तृप्ति की भावना लेकर यहां देश के कई प्रांतो समेत नेपाल व भूटान आदि देशों से वर्ष पर्यंत श्रद्धालु आते रहते हैं। पितृ पक्ष में यहां श्राद्ध की महत्ता कई गुना बढ़ जाती है। इसलिए पितृ पक्ष में यहां देश-विदेश से हजारों की संख्या में लोग श्राद्ध व पिंड दान करने आते हैं। पिंड दान की क्रिया में सर्वप्रथम सर मुड़वाकर तीर्थ में स्नान करना आवश्यक होता है।
इसके बाद अन्य क्रियाएं की जाती हैं। तीर्थ के जल में इस कदर काई लगी है कि स्नान तो दूर श्रद्धालु आचमन करने तक से कतराते हैं। श्रद्धालुओं को परिसर में लगे इंडिया मार्का हैंडपंप से स्नान करने पर मजबूर होना पड़ता है। तीर्थ के आसपास साफ-सफाई के अभाव में झाड़ी व घासफूस उग आई है। इन समस्याओं के बीच आधे अधूरे भाव से श्रद्धालुओं को पितृ कार्य करना पड़ता है।
काशी कुंड की प्रमुख समस्याएं
- तीर्थ पर सिर्फ हैंडपंप होने से पितृपक्ष में लोगों को स्नान के लिए मशक्कत करनी पड़ती है ।
- तीर्थ में जल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है। दूषित जल निकल ही नहीं पाता।
- तीर्थ के प्रांगण में बने हाल में अभी तक रंगरोगन नहीं हो सका है। प्रकाश और पंखे की व्यवस्था ध्वस्त है।
- तीर्थ में जल व्यवस्था के लिए लगा समरसेबुल खराब पड़ा है जिससे तीर्थ में पानी की विकट समस्या बनी रहती है। जब प्रशासन व्यवस्था नहीं करता, तब यहां पितृ कार्य कराने वाले जोशी समाज के लोग चंदा एकत्र कर जल भरवाते हैं।
काशी कुंड का महत्व व मान्यताएं
देश में हिदू धर्म की मान्यता के अनुसार तीन स्थानों पर गया कर्म किया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार गयासुर नामक राक्षस का जब वध हुआ तो उसके शरीर के तीन भाग हुए। ऊपर का भाग अर्थात मुख बद्रीनाथ में, नीचे का भाग यानी चरण भाग गया जी बिहार एवं मध्य भाग उदर नैमिषारण्य में गिरा। इसीलिए कपाल गया बद्रीनाथ में, चरणगया गया जी बिहार एवं नाभि गया नैमिषारण्य में होती है।
मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी काशीकुंड उपेक्षित
नैमिषेय शंखनाद के समापन कार्यक्रम में 8 दिसंबर 2017 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नैमिष तीर्थ विकास के लिए 90 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की गई थी। इसमें 94 लाख रुपये से काशी कुंड तीर्थ का सौंदर्यीकरण की बात कही थी। सीएम की घोषणा के बाद भी तीर्थ अभी विकास से कोसों दूर है।
यहां इस विधि से कर्मकांड से मिलती पितरों को तृप्ति
कर्मकांड कराने वाले गिरिवर जोशी बताते हैं, कि पितृपक्ष में इस तीर्थ का विशेष महत्व है। जो व्यक्ति घर पर धन के अभाव में अपने परिवारीजन का विधिपूर्वक दाह संस्कार नहीं कर पाता, वो यहां आकर विधि विधान से जौं के आटे से बने पुतले के माध्यम से कर्मकांड करते हैं। इससे मृतक की आत्मा को मुक्ति मिलती है। यहां पर प्राणि की तृप्ति के लिए गात्र, खोडशी श्राद्ध, नारायनबली, सहपिंडी, दसवां आदि कार्य कराए जाते हैं।
इधर भी ध्यान दे सरकार और अफसर
मुख्यमंत्री ने काशीकुंड तीर्थ के विकास का वादा किया था। छह साल बाद भी तीर्थ बदहाल है। कोई विकास नहीं हुआ है। शासन-प्रशासन को यहां की समस्याओं पर ध्यान देने की जरूरत है।
- राजेंद्र शर्मा, तीर्थ पुरोहित
समुचित प्रबंध होगा
पितृ पक्ष शुरू होने से पहले ही तीर्थ स्थल पर सफाई एवं जल आपूर्ति का समुचित प्रबंध कर लिया जाएगा।
- प्रवीण कुमार, बीडीओ मिश्रिख