गंदगी के बीच दिया जा रहा एमडीएम
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जिले के अधिकांश स्कूलों में गुणवत्ताहीन भोजन परोसा जा रहा है। रसोईघरों के आसपास गंदगी की भरमार रहती है। भोजन बनाने में बेहद निम्न क्वालिटी के मसाले प्रयोग किए जाते हैं।
तहरी की हालत यह है कि केवल उसके चावल को पीला किया जा रहा है। न तो चावल की गुणवत्ता ठीक है, न ही उसमें कुछ मिलाया जा रहा है। वहीं दूध का वितरण अधिकांश स्कूलों में नहीं हो रहा है।
जिले में मध्याह्न भोजन योजना पर प्रतिवर्ष करीब 30 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इस बजट में केवल कन्वर्जन कास्ट ही शामिल है। जबकि खाद्यान्न अलग से मिलता है। इतनी भारी भरकम रकम खर्च होने के बावजूद भोजन में गुणवत्ता नहीं आ रही है।
शिक्षक सिर्फ काम चलाऊ तरीके से भोजन बनवा रहे हैं। वह न तो गुणवत्ता का ख्याल रख रहे हैं, न ही रसोई घर की साफ-सफाई का। इसका खुलासा स्कूलों के औचक मुआयने व भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में हुआ है। ऐसे में सरकार की मंशा पर शिक्षक पानी फेर रहे हैं। जिस उद्देश्य के लिए यह योजना शुरू की गई थी, वह दम तोड़ती हुई नजर आ रही है।