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Siddharthnagar News: ढाई करोड़ के वेंटिलेटर गिन रहे खुद की सांसें, जिंदगी बचाने के लिए भटक रहे मरीज

Fri, 27 Oct 2023 11:59 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
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मेडिकल कॉलेज की महिला अस्पताल में रखा पड़ा वेंटिलेटर मशीन। संवाद
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माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में कोरोना काल में खरीदे गए ढाई करोड़ रुपये से अधिक के वेंटिलेटर फांक रहे धूल
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मेडिकल कॉलेज से निजी अस्पताल जाते हैं 20 से 25 मरीज, सिर में गंभीर चोट, हार्ट अटैक और सर्जरी के गंभीर मरीजों का नहीं हो पा रहा है इलाज
संवाद न्यूज एजेंसी

सिद्धार्थनगर। बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत जानना है तो माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज आइए। यहां से सिर मेें गंभीर चोट, हार्ट अटैक सहित अन्य गंभीर मरीज निजी अस्पताल में जाकर जेबें ढीली करने के लिए विवश हैं। अस्पताल के पास कोरोना काल में खरीदे गए ढाई करोड़ रुपये से अधिक कीमत के 58 वेंटिलेटर धूल के बीच खुद बीमार नजर आ रहे हैं। जिम्मेदारों की उदासीनता के कारण इनका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में हर दिन 20 से 25 गंभीर मरीजों को निजी अस्पताल जाना पड़ रहा है।
जिला अस्पताल के माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में तब्दील होने के बाद नाम बड़ा हो गया और मरीजों का बोझ भी बढ़ गया, लेकिन बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के दावे यहां हर दिन दम तोड़ रहे हैं। कारण यह कि मेडिकल कॉलेज में न तो वेंटिलेटर पर मरीजों को रखकर इलाज करने के लिए वार्ड बना है और न ही अब तक ट्राॅमा सेंटर है। ऐसे में हर दिन सड़क हादसे में सिर में गंभीर चोट वाले मरीजों को निजी अस्पताल में जाना पड़ता है। यही हार्ट अटैक और लकवा के शिकार मरीजों का है। वेंटिलेटर संचालित होने वाला वार्ड न होने के कारण गोरखपुर मेडिकल कॉलेज या फिर निजी अस्पताल में जाने की विवशता है। सिजेरियन डिलीवरी के गंभीर मरीजों को भी निजी अस्पताल में ही जाना पड़ रहा है।
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मौजूदा समय में वार्डों में पड़े वेंटिलेटर धूल के बीच आखिरी सांसें गिन रहे हैं। अगर इनका उपयोग होता तो शायद ये मरीजों को सांस देते और उन्हें निजी अस्पताल में जाकर वेंटिलेटर के लिए प्रतिदिन एक से डेढ़ हजार रुपये देना नहीं पड़ता। जिम्मेदार बेखबर हैं।



24 घंटे का डेढ़ से दो हजार रुपये चार्ज

स्वास्थ्य विभाग से जुड़े लोगों के मुताबिक, अगर मरीज वेंटिलेटर पर आ गया तो उसका खर्च सामान्य व्यक्ति कई दिनों तक नहीं उठा सकता है। कारण यह कि वेंटिलेटर पर निजी अस्पताल में एक मरीज पर 24 घंटे में 1500-2000 हजार रुपये लगते हैं। वहीं, सरकारी अस्पताल में बेड की बहुत न्यूनतम फीस ली जाती है। कई अस्पतालों में यह सुविधा निशुल्क रहती है।



इलाज संभव पर करना पड़ा रेफर

कुछ दिन पहले ही कांशीराम आवास के रहने वाले मोनू पर कुछ लोगों ने धारदार हथियार से हमला कर दिया था। सिर और कान के पास गंभीर जख्म के कारण हमले के बाद से वह बेहोश था। प्राथमिक उपचार के बाद उसे गोरखपुर रेफर करना पड़ा। क्योंकि यहां पर वेंटिलेटर की जरूरत थी। तभी आगे उसका इलाज हो पाता। ऐसे कई मरीज इलाज संभव होते हुए भी वेंंटिलेटर का संचालन न होने से अन्य अस्पतालों में जाने के लिए विवश हैं।



केस एक
सिर में गंभीर चोट, रेफर हुआ बच्चा

दो वर्षीय आफरी के सिर में गंभीर चोट आई थी। उसे शुक्रवार सुबह इमरजेंसी में लाया गया। वेंटिलेटर की व्यवस्था न होने के कारण बच्चे को बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर रेफर किया गया। यदि वेंटिलेटर की सुविधा होती तो जान बचाने के लिए गोरखपुर तक भाग-दौड़ नहीं करनी पड़ती। कभी-कभी गंभीर मरीजों को लेकर यात्रा करने के दौरान भी जान जोखिम में पड़ जाती है।


नहीं हो पाया था महिला का ऑपरेशन
उसका में अवैध रूप से संचालित निजी अस्पताल में सर्जरी के दौरान महिला के पेट में स्पंज छूट गया था। जब तबीयत बिगड़ी तो परिवार के लोगों ने उसे माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज के संयुक्त जिला अस्पताल में भर्ती कराया था। शरीर में खून की अधिक कमी और आईसीयू की सुविधा नहीं होने के कारण डॉक्टर ने रेफर कर दिया था। शोहरतगढ़ के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान महिला की मौत हो गई।

कोरोना कॉल में की गई थी वेंटिलेटर की खरीद

कोरोना काल में सांस में तकलीफ और फेफड़े में संक्रमण के मामले बढ़ रहे थे। ऐसे में मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत थी। मरीजों की जिंदगी बचाने और आखिरी सांस तक उन में दम भरकर नया जीवन देने के लिए तीन बार में 58 वेंटिलेटर आए थे। इसमें नार्मल, फेस मास्क और मैकेनिकल शामिल थे। इसमें नार्मल श्रेणी की एक मशीन की कीमत डेढ़ से सवा दो लाख रुपये। फेस मास्क श्रेणी वाली मशीन 5.70 लाख रुपये। जबकि मैकेनिकल श्रेणी वाली मशीन की कीमत छह लाख रुपये से अधिक है। ढाई करोड़ रुपये से अधिक कीमत की वर्ष 2020, 2021 और 2022 में 58 मशीनों की खरीद हुई थी।

इन मरीजों को वेंटिलेटर की पड़ती है जरूरत

सिर और सीने मेें गंभीर चोट, हार्ट अटैक, लकवा, लीवर और किडनी काम नहीं करने वाले और ऑपरेशन करने के बाद कुछ मरीजों को वेंटिलेटर की अति आवश्यकता पड़ती है। वेंटिलेटर की सुविधा न होने के कारण ऐसे मरीजों को चिकित्सक पहले ही स्थिति देखते हुए रेफर कर देते हैं। कारण यह कि इन्हें रखना जोखिम पूर्ण होता है।
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इतने वेंटिलेटर से चल जाएंगे कई वार्ड

आकड़ों के मुताबिक, 58 वेंटिलेटर हैं। अगर इन मशीनों का उपयोग हो तो 20 बेड का ट्राॅमा सेंटर, 20 बेड का आईसीयू और 18 बेड अन्य गंभीर मरीजों के लिए बन जाएगा। इससे यहां के लोगों को बड़ी सहूलियत मिलेगी, लेकिन सुविधाओं के न होने के कारण इलाज संभव होते हुए भी लोग बाहर जाने के लिए विवश हैं।
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