सिद्धार्थनगर। जंग-ए-आजादी में बांसी तहसील क्षेत्र के तेजगढ़ के लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। आंदोलनकारियों से नाराज अंग्रेजों ने इस गांव को तीन बार फूंका और आजादी के दीवानों को उनके घरों से बेदखल करने की कोशिश की। लोगों को काफी यातनाएं दी गईं, बावजूद इसके क्रांतिकारियों ने हार नहीं मानी और आजादी की लड़ाई लड़ते रहे।
बांसी कस्बे से पांच किमी दूर बसे तेजगढ़ गांव के लोगों ने गांधीजी के विदेशी सामान के बहिष्कार के आह्वान पर तेजगढ़ गांव में नमक बनाने की भट्ठी लगाना शुरू कर दिया। अंग्रेज अधिकारियों ने अपनी फौज व बांसी थाने की पुलिस ले जाकर तेजगढ़ गांव में बनी भट्ठी को तोड़ दिया और गांव में आग लगवा दी।
भट्ठी लगवाने वाले द्वारिका प्रसाद यादव तो भागने में सफल हो गए लेकिन, उनके पिता अयोध्या प्रसाद को पकड़कर अंग्रेजी फौज ने बहुत यातना दी। कुछ दिनों बाद गांव वापस आकर द्वारिका यादव ने लोगों को संगठित किया और आंदोलन शुरू कर दिया। इस आंदोलन में द्वारिका यादव के सहयोगी विष्णु सहाय पांडेय, जगन्नाथ, सीताराम आदि भी शामिल हुए। आंदाेलन नहीं थमने पर अंग्रेजों से मिले सामंत ने फिर से तेजगढ़ गांव को फुंकवा दिया। आंदोलनकारियों को जबरन घर से बेदखल कर इनके घरों में दूसरों को बसा दिया।
वर्ष 1922 में ब्रिटिश सरकार के विरोध में पूरे देश में असहयोग आंदोलन जोरों पर था। क्षेत्र के तेजगढ़, भगौतापुर, अड़गड़हा, मधुकरपुर, हरैया आदि गांवों के लोग भी उसमें शामिल हुए। यहां के लोगों के आंदोलन को देख गोरखपुर के तेरह कांग्रेसी यहां पहुंचे और सामंत के अत्याचार के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया। उसमें मिठवल के गिरी बाबा का महत्वपूर्ण योगदान था। आंदोलन को को समाप्त कराने के लिए अंग्रेजों के पिछलग्गू सामंत ने आंदोलनकारियों के पैर को बांधकर घोड़े से खिंचवाया। समय बीतता गया और वर्ष 1942 में करो या मरो का नारा देश में बुलंद हुआ।
बांसी कस्बा स्थित आर्यसमाज मंदिर में कांग्रेसियों ने द्वारिका प्रसाद यादव की अगुवाई में गुप्त बैठक कर तहसील के खजाने को लूटने, बांसी-उसका बाजार टेलीफोन लाइन काटने व बांसी थाने पर कब्जा करने की योजना बनाई। 21 अगस्त 1942 की रात में इस योजना को अमल में लाने का प्रयास किया गया और मधुकरपुर गांव के पास बांसी-उसका बाजार टेलीफोन लाइन को काट दिया गया।
हालांकि, पूरी योजना अमल में नहीं लाई जा सकी और उससे पहले ही मुखबिरी के कारण अंग्रेजों ने क्षेत्र के 56 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। आजादी के वर्षों बाद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी द्वारिका प्रसाद के अथक प्रयास से तेजगढ़ गांव में शहीद स्मारक स्थल पार्क बनाकर वहां चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा लगाने के साथ 56 आंदोलनकारियों के सम्मान में शिलापट भी लगाया गया। इस क्षेत्र के लोग आज भी तेजगढ़ गांव की गौरव गाथा का गुणगान करते हैं।