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Siddharthnagar News: कालानमक धान की खेती का पहली बार हो रहा जियो टैगिंग सर्वे

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-क्यूआर कोड से पता चलेगा कि किसके खेत में कितना पैदा हुआ धान, मिलावट के धंधे पर कसेगा शिकंजा
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-सर्वे करने में जुटे 250 कर्मचारी, 10 अक्टूबर तक तैयार होगी रिपोर्ट
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। जिले में पहली बार कालानमक धान के खेतों का जियो टैगिंग सर्वे करके रिपोर्ट तैयार की जा रही है। उसके बाद आसानी से पता लगेगा कि कितने किसानों ने कितने रकबे में कालानमक प्रजाति के धान की खेती की है, उनके उत्पादन कितना होगा? इसके साथ ही क्यूआर कोड जनरेट किया जाएगा, जिसके माध्यम से देश-विदेश का कोई भी ग्राहक किसानों से सीधे संपर्क करके कालानमक धान खरीद सकता है। ऐसी पहल से बिचौलियों की दखल कम हो जाएगी और कालानमक चावल के मिलावट के धंधे पर अंकुश लगेगा।
साल 2018 में कालानमक चावल को एक जिला एक उत्पाद में शामिल किया गया तो ब्रांडिंग-मार्केटिंग से मांग और कीमत में लगातार बढ़ोतरी होती गई। इसमें मिलावटखोरों ने काली कमाई का धंधा निकाला, जिससे कालानमक चावल की साख गिर रही थी। कालानमक चावल के निर्यात प्रोत्साहन बोर्ड बनने के बाद जिले में चावल की गुणवत्ता की जांच की प्रयोगशाला नहीं बन पाई। ऐसी स्थिति में जियो टैगिंग सर्वे कराया जा रहा है।
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सर्वे में करीब 250 लेखपाल और कृषि विभाग के कर्मचारी रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं। वे खेतों में जा रहे हैं और किसानों से बातचीत भी कर रहे हैं। खेत की फोटो और रकबे के साथ जियो टैगिंग की जा जा रही है। जिलाधिकारी डॉ. राजा गणपति आर के निर्देश के अनुसार 10 अक्टूबर तक रिपोर्ट तैयार करनी है। उसके बाद क्यूआर कोड जनरेट होगा, जिसमें जिले में कालानमक की खेती करने वाले सभी किसानों के उत्पादन की रिपोर्ट भी सामने आएगी।

स्वाद और खुशबू के अनुसार तय होगा दाम
कालानमक चावल की विभिन्न प्रजातियों के स्वाद और सुगंध के अनुसार कीमत भी तय की जाएगी। जिलाधिकारी ने कालानमक चावल निर्यात प्रोत्साहन बोर्ड को कीमत तय करने का निर्देश दिया है। सर्वे में परंपरागत लंबी डंठल, शोध से इजाद छोटी कम दिन में पैदा होने वाली प्रजातियां और जैविक खेती से पैदा हुए धान की रिपोर्ट सामने आएगी।

18 हेक्टेयर हो गया कालानमक धान का रकबा
जिले में 18 हेक्टेयर क्षेत्र में कालानमक धान की खेती की जा रही है। परंपरागत प्रजाति का धान 165 दिन में तैयार होता है, जबकि नई प्रजातियों के धान 145 से 155 दिन में तैयार होते हैं। छोटी डंठल वाली प्रजातियों में प्रति हेक्टेयर 35 से 40 क्विंटल पैदावार होता है, जबकि परंपरागत प्रजाति में 15-16 क्विंटल धान पैदा होता है। दोनों के स्वाद और सुगंध में भी अंतर होता है।
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किसानों की बात
कालानमक धान और चावल की कीमत तय करना बड़ी पहल है। मिलावट के कारण कीमत तय करना मुश्किल हो गया था। अब गुणवत्ता चावल की अच्छी कीमत मिलेगी।
-सोनू गुप्ता, रमवापुर, मोहना
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जियो टैगिंग सर्वे के बाद खरीदारों का संपर्क सीधे किसानों से हो जाएगा, उसके बाद बिचौलियों को मिलावट का अवसर कम मिलेगा, क्योंकि किसान मिलावट नहीं करते हैं।
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-अजीजुर्रहमान, रामपुर, मोहाना


वर्जन
कालानमक धान की खेती का जियो टैगिंग सर्वे कराया जा रहा है। इसमें कालानमक की विभिन्न प्रजातियों के धान की खेती की रिपोर्ट तैयार होगी और क्यूआर कोड के माध्यम से कालानमक के बारे में अच्छी जानकारी मिल जाएगी। कालानमक धान व चावल की कीमत भी तय की जाएगी। इससे कालानमक चावल का बाजार और बेहतर होगा।
-डॉ. राजा गणपति आर, जिलाधिकारी
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