बांसी। आजादी की लड़ाई में अपना सबकुछ न्यौछावर करने में बांसी क्षेत्र किसी भी अंचल से पीछे नहीं रहा है। देश को आजाद कराने की भावना से ओतप्रोत कई दीवानों ने हंसते-हंसते अपने आप को कुर्बान कर दिया। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। इसके लिए हमारे सेनानियों ने जो कीमत चुकाई उसके पीछे गौरवशाली इतिहास है।
प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद स्वतंत्रता आंदोलन को रोकने के लिए सन 1919 को रॉलेट एक्ट जैसा काला कानून अंग्रेजों ने देश पर लाद दिया। महात्मा गांधी ने जब इसका विरोध किया तो पूरे देश में विरोध-प्रदर्शन और गोली बारी का दौर शुरू हो गया। इसी बीच जलियावाला बाग कांड हुआ। परिणामस्वरूप कश्मीर से कन्याकुमारी तक विरोध की ज्वाला धधक उठी। जिसमें बांसी नगर में स्थित रतन सेन इंटर काॅलेज के सभी बच्चे स्कूल से निकलकर इस आंदोलन मे कूद पड़े खिलाफत आंदोलन भी इसी बीच शुरू हो गया। हिन्दू मुस्लिम आपस में मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़े।
बांसी कस्बे से पूरब, लगभग पांच किलोमीटर पर बसे तेजगढ़ गांव के लोगों ने पंचायत गठित कर ब्रिटिश सरकार का विरोध करना शुरू कर दिया। इससे घबराए अंग्रेज सरकार के समर्थक अष्टभुजा प्रसाद ने तेजगढ़ गांव को फूंकवा दिया और पंचायत के मुखिया अयोध्या प्रसाद यादव को पीटकर गांव से निकाल दिया। इसके बाद पूरे क्षेत्र मे विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था। आंदोलनकारियों पर अंग्रेजी सैनिकों मे घोड़ा दौड़ाया, कोड़ोंसे पीटा। इसमे कई क्रांतिकारी शहीद हो गए थे।
स्वतंत्रता आंदोलन में नगर क्षेत्र निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रमाशंकर आर्य, नेता श्यामलाल, रामशंकर, रामकृष्ण, मो सलीम राम आसरे तिवारी सहित ग्रामीण क्षेत्र के ढोढे गिरी मिठवल, बृज नंंदन डढ़वा घाट, राम कुमार शास्त्री खेसरहा, द्वारिका प्रसाद यादव तेजगढ़, विष्णु सहाय तेजगढ़, बृज मोहन डढ़वा घाट, पारसनाथ मुड़िला राजा, पारस कल्लाखोर, महादेव सेहरी, हैसियत मनिकौरा,अवधेश तिवारीपुर, जगदीश प्रसाद गौरा, महावीर प्रसाद सिसहनिया, रामजस दूबे खिरिया, मुनेश्वर प्रसाद मुड़िला राजा आदि ने स्थानीय सामन्तों व अंग्रेजी हुकूमत की काफी यातनाओं को झेला। इनके ऊपर जमकर फिरंगियों का कहर टूटा इसके बावजूद देश को आजाद कराने के अपने एक मात्र उद्देश्य पर डटे रहे। इसके लिए इन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा था।