डॉक्टर और मरीज माफिया का जबरदस्त है गठजोड़, तोड़ नहीं ढूंढ पा रहा है प्रशासन
अब अस्पताल संचालकों ने छोड़े अपने दलाल, फंसाकर मरीजों को कर रहे कंगाल
बीमारी के हिसाब से मरीजों पर लगती है बोली, होता है सौदा
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में सक्रिय हैं मरीज माफिया
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में मरीजों का सौदा हो रहा है। अस्पताल से ही उन्हें बेच दिया जा रहा है। यह सुनकर हैरानी जरूर होगी, लेकिन यह सच है। क्योंकि यहां डॉक्टर और मरीज माफिया का गठजोड़ इतना जबरदस्त है कि प्रशासन को उसका तोड़ नहीं मिल पा रहा है। जैसे-जैसे अस्पताल में उनकी घुसपैठ बढ़ी, दिन-दूना रात चौगुना संपत्ति बनाते जा रहे हैं। यही कारण है कि दो साल पहले तक अस्पताल में सामान्य नौकरी करने वाले एलटी और मेडिकल स्टोर पर मरीजों को लेकर जाकर बेचने वालों के पास लाखों रुपये के मकान और अपनी कार हो गई है। दलाली का धंधा जगजाहिर है, लेकिन इन पर अंकुश लगाने की कोशिश होती भी नहीं दिख रही है।
सरकारी अस्पताल में निशुल्क और मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं दिलाने का सरकार दम भर रही है। पर हकीकत कुछ और ही है। यहां बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने वाले स्वास्थ्यकर्मी और मरीज माफिया उन्हें बेचने का कार्य कर रहे हैं। कुछ ऐसे चेहरे हैं जो अस्पताल में नियमित नजर आते हैं। उन्हें देखने के बाद यह कह पाना मुश्किल है कि वह स्वास्थ्यकर्मी हैं या बाहरी व्यक्ति। कारण उनकी घुसपैठ और डॉक्टरों से गठजोड़ इतनी जबरदस्त है कि वह डॉक्टर के इर्दगिर्द ही नजर आते हैं। इसलिए मरीज समझने में चूक जाते हैं। दलाल चिकनी-चुपड़ी बातों में फंसाकर डॉक्टरों के इशारे पर निजी अस्पताल में ले जाते हैं, जहां उनका बीमारी के हिसाब से सौदा होता है।
मरीजों का शोषण करके कई लोग बेहिसाब संपत्ति के मालिक बन गए हैं। अस्पताल में सामान्य नौकरी करने वाला कर्मी खुद अस्पताल का मालिक बन गया तो वहीं, मरीज को मेडिकल स्टोर तक पहुंचाने वाला शख्स खुद मेडिकल स्टोर संचालक हो गया। जमीन खरीद करके बड़ा मकान बना लिया। बच्चों को बड़े स्कूल में दाखिला दिला लिया है।
जानते हैं यह सब संभव कैसे हुआ, सब मरीजों का शोषण करके। ऐसा मेडिकल कॉलेज में वर्षों से काम करते चले आ रहे कर्मियों का कहना है। अस्पताल से इनकी घुसपैठ की तोड़ न तो प्रशासन निकाल पा रहा है और न ही मेडिकल कॉलेज के जिम्मेदार। इसलिए मरीजों का शोषण हो रहा है और उन्हें बेचने वाले धनवान बन रहे हैं।
मरीजों को बेचकर खड़ी कर ली इमारत
मरीजों को बेचने के धंधे का खेल है कि बाहर से आकर एक व्यक्ति ने एक छोटा सा मेडिकल स्टोर खोला। एक मेडिकल स्टोर कर्मी ने जमीन खरीदी और आलीशान मकान बनवा लिया है। कारण यह कि उससे जुड़े दलाल रात में भी मरीजों को दवा मुहैया कराने के बहाने दलाली का धंधा जमाए हुए हैं।
स्वास्थ्यकर्मी ने बना दिया बड़ा अस्पताल
मेडिकल कॉलेज मेें तैनात एक स्वास्थ्यकर्मी लैब में कार्य करता है। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े लोगों के मुताबिक पता नहीं कैसी सेटिंग हुई और अस्पताल में रहते हुए लाखों की रुपये की जमीन खरीद ली। इसके बाद एक करोड़ रुपये से अधिक की लागत से अस्पताल खड़ा कर दिया। कमाई का साधन नौकरी ही है, उसमें भी इतना नहीं मिलता है कि कोई जमीन खरीद कर अस्पताल खड़ा कर लेगा।
हर कदम पर मिलते हैं मरीज माफिया के गुर्गे
मरीज को नर्सिंग होम भेजने के लिए तीन स्तर पर काम होता है। पहले तो एंबुलेंस व ऑटो वाले सक्रिय रहते हैं। दूसरा इमरजेंसी भेजने में कर्मचारी की तरह कार्य करने वाले लोग। तीसरा मरीज अच्छा सुझाव टेकर बाहर वाले कर्मचारी। एक और स्तर भी है, जो बाहर के मरीज को सरकारी में जाने ही नहीं देता। उससे यह कह देता है कि वहां पर न तो इलाज है और न ही बेड खाली रहते हैं। इस स्तर के चक्र्रव्यूह से कोई मरीज बच गया तो वह निशुल्क इलाज करा पाता है।
इतने में बिकता है एक मरीज
दलाली के खेल को जानने की कोशिश की गई तो पता चला कि एक मरीज को प्राइवेट अस्पताल भेजने पर पहले 10 हजार मिलते थे। लेकिन यह रकम 15 हजार रुपये तक पहुंच गई है। इसमें 10 हजार एंबुलेंस या फिर ऑटो से पहुंचाने वाले माफिया और पांच हजार सूचना देने वाले मरीज को एंबुंलेस तक पहुंचवाने वाले समेत अन्य का हिस्सा होता है। अगर मरीज आईसीयू में भर्ती होने लायक है तो 25 से 30 हजार रुपये भी मिल सकते हैं। एंबुलेंस माफिया को यह रकम नर्सिंग होम से नकद दी जाती है।
कई मामलों में इलाज की रकम के हिसाब से मिलता है कमीशन
मरीज माफिया का हर दिन कारनामा देखने वाले एक स्वास्थ्यकर्मी ने बताया कि मरीज को निजी अस्पताल तक भेजने में बड़ा खेल होता है। पहले मरीज के पहुंचाने के रुपये मिलते थे। लेकिन जब अस्पतालों की संख्या बढ़ी तो कमीशन का तरीका बदल गया। अब मरीज माफिया एक मरीज के इलाज पर हुए खर्च पर प्रतिशत में कमीशन लेते हैं। इसलिए यह राशि बढ़ जाती है और बोझ मरीजों पर पड़ता है।
अस्पताल से करवाया रेफर, लुट गए तो फिर वहीं पहुंचे
कुछ दिन पहले एक महिला को लेकर उसके परिवार के लोग पहुंचे। यहां ब्लड की कमी और मरीज को गंभीर बताते हुए दलालों ने इमरजेंसी में ही उसे फंसा लिया। इसके बाद उसे लेकर निजी अस्पताल में चले गए। वहां एक ने 75 हजार रुपये तीन दिन में खून चढ़ाने और दवा के नाम पर ले लिए। जब हालत बिगड़ी तो दोबारा फिर मेडिकल कॉलेज लेकर आए। इलाज हुआ और एक सप्ताह में मरीज ठीक हो गई। वह शोहरतगढ़ क्षेत्र की रहने वाली थी।
घायल मरीज को पहुंचा दिया निजी अस्पताल
कुछ माह पहले ही शोहरतगढ़ के पास एक हादसे में एक युवक जख्मी हो गया। पुलिस की मदद से उसे मेडिकल कॉलेज में भर्ती करवाया गया। परिजन पहुंचे तो डॉक्टरों ने स्थिति गंभीर बताते हुए गोरखपुर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया। पल भर में एंबुलेंस माफिया ने उसे घेर लिया। उन्हें गुमराह किया कि दूर ले जाने के तक में कुछ भी हो सकता है। एक निजी अस्पताल में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं हैं। वहां पहुंचा दिए और एक रात में 50 हजार रुपये से अधिक खर्च हुए। इसके बाद लखनऊ लेकर जाना पड़ा।
डॉक्टर से भिड़ जाते हैं मरीज माफिया
मरीजों के बेचने और निजी अस्पताल पहुंचाने का खेल अक्सर रात में ही होता है। रात में मरीज माफिया पूरी तरह से तैयार रहते हैं। इनके पास लड़कों की फौज होती है। किसी गंभीर मरीजों को लेकर जाने में अगर कोई बाधा बनता है तो उससे मारपीट करवा देते हैं। इसमें कई बार मरीज को बाहर ले जाने से रोकने पर इमरजेंसी में विवाद हो चुका है। डॉक्टर पर भी हाथ छोड़ने से पीछे नहीं हटते हैं।
पुलिस तो तैनात लेकिन ड्यूटी से मतलब
अक्सर होने वाले विवाद को देखते हुए मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी वार्ड पर पुलिस कर्मियों की ड्यूटी तो लगा दी गई है। लेकिन देखते ही देखते मरीज माफिया इनसे भी घुल मिल जाते हैं। फिर क्या जो चाहे करें, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है।
बाहर की दवा लिख रहे अंदर बैठे डॉक्टर
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मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में बैठे डॉक्टर मरीजों को बाहर की दवा लिख रहे हैं। जैसे ही मरीज ओपीडी कक्ष से बाहर निकलते हैं तो दलाल उनके पीछे पड़ जाते हैं। वे छूट का लालच देकर मेडिकल स्टोर तक ले जाते हैं और अपना कमीशन पक्का कर कर लेते हैं।
ओपीडी में बृहस्पतिवार को बांसी के दिलीप चंद्र ने एक महिला मरीज को स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में दिखाया तो डॉक्टर ने 380 रुपये की दवा बाहर की लिख दी। उसी दौरान लोटन के रामानंद भी ओपीडी से बाहर निकले तो डॉक्टर ने उन्हें छोटी पर्ची थमा दी। एक युवक ने उन्हें मेडिकल स्टोर का पता बताया तो उन्होंने 355 रुपये की दवा खरीदी। उन्होंने बताया कि सरकारी काउंटर पर पूरी दवा नहीं मिली।
मेडिकल स्टाेर में लग गई डॉक्टरों की कुर्सी
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज बनने के बाद इससे संबद्ध संयुक्त जिला अस्पताल के आसपास मेडिकल स्टोर व जांच सेंटर तेजी से बढ़ गए है। सीएमओ कार्यालय के पीछे से कलक्ट्रेट के सामने तक के मेडिकल स्टोर में मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों की कुर्सी लगी है। वे वहां जाकर भी मरीजों को दवा लिख रहे हैं। निजी अस्पतालों में मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के नाम लिखे हुए हैं। जबकि मेडिकल स्टोर के काउंटर पर डॉक्टरों के नंबर लगाए जा रहे हैं।
कोट
मेडिकल काॅलेज में दलाली करने पर नजर रखी जा रही है। जो पकड़ा जाएगा, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। अक्सर दलाल मरीजों के साथ घुल-मिलकर परिजन बन जाते हैं तो उन्हें पकड़ना मुश्किल हो जाता है। लोगों को भी चाहिए कि शिकायत करें ताकि कार्रवाई करने में आसानी हो। बाहर की दवा लिखने के मामले में पूछताछ की जाएगी।
-डॉ. एके झा, प्रभारी प्राचार्य, मेडिकल काॅलेज