और देखते ही देखते ढह गया था ढांचा
गोरखपुर के रहने वाले चंद्रेश्वर सिंह बताते हैं कि वह बजरंगदल से जुड़े थे। विश्व हिंदू परिषद के बद्री सिंह के नेतृत्व में वह 10 लोगों के साथ अयोध्या के लिए निकल गए। वहां पहुंचे तो कहा गया कि प्रतीक कारसेवा होगी। लेकिन, अबकी बार लोग मन बनाकर आए थे कि चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन, ढांचा नहीं रहेगा।
वह बताते हैं कि दक्षिण भारत के कारसेवक कुल्हाड़ी, खंती, गैंता आदि लेकर आए थे, जिससे ढांचा गिराया जा सके। अचानक कारसेवक बाबरी ढांचे पर चढ़ गए। लालकृष्ण आडवाणी, आचार्य धर्मेंद्र, साध्वी ऋतभरा सहित अन्य लोग कारसेवकों को मना करने लगे कि ढांचा न तोड़ें। लेकिन, कोई सुनने वाला नहीं था। देखते-देखते ढांचा ध्वस्त हो गया।
राजमाता के साथ कारसेवा का मौका मिला
गगहा थाना क्षेत्र के गरयाकोल गांव निवासी रामनगीना राव अपने साथियों के साथ कारसेवा के लिए अयोध्या पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि जब उनके गांव के कुछ साथी अयोध्या जाने लगे और वह भी तैयारी करने लगे तो उनकी पत्नी ने उन्हें घर में बंद कर दिया। बहुत सिफारिश के बाद यह कहकर घर से निकले कि अयोध्या नहीं जाएंगे, लेकिन साथियों के साथ अयोध्या पहुंच गए। जब सरयू नदी से रेत लेकर पहुंचे तो कारसेवक गुंबद पर चढ़ गए थे। देखते ही देखते ढांचा ध्वस्त हो गया।
थोड़ी देर बाद वहां पर एक छोटे से मंदिर का निर्माण भी होने लगा। वहीं पर राजमाता विजयराजे सिंधिया कारसेवा कर रही थीं। वह भी उनके साथ कारसेवा में लग गए। ईंट लाकर देने लगे और राजमाता का सहयोग करने लगे। राजमाता बहुत देर तक वहां रहीं। उसके बाद वह चली गईं तो हम लोग भी निकल लिए।