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Siddharthnagar News: घाट पर जमकर नाचे, पानी में गिरा दी प्रतिमा, रुपये, कपड़ों के लिए मची लूट

Fri, 27 Oct 2023 12:12 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
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अमर उजाला लाइव

प्रतिमा का नहीं, आस्था का हुआ विसर्जन, कहीं मची रुपये की लूट तो कहीं कपड़ों के लिए मारामारी



संवाद न्यूज एजेंसी

सिद्धार्थनगर। शहर, कस्बों व गांवों में लंबे इंतजार और तैयारी के बाद नौ दिन मां दुर्गा की आराधना.... और अंत में ऐसी विदाई। घाटों पर विसर्जन के दौरान प्रतिमाओं को पोखरे में गिराने, पैरों तले पूजन सामग्री और चढ़ावे की रकम के लिए मारपीट आस्था से खिलवाड़ करने वाले दृश्य मन उद्वेलित करने वाले थे। जमकर नाचने के बाद पोखरे में प्रतिमाओं का विसर्जन और उसके बाद प्रतिमाओं के कपड़े और रुपयों की माला के लिए मची मारामारी चर्चा का विषय रही।



शहर की प्रतिमाओं के विसर्जन लिए जमुआर पुल के पास नहर में विसर्जन हुआ। मंगलवार रात में अधिक संख्या में प्रतिमाओं का विसर्जन हुआ। जबकि दो दिन बाद बृहस्पतिवार को भी तालाब में पलटीं प्रतिमाओं से साड़ी, शृंगार के सामान और रुपयों को निकालने की होड़ मची थी। इसमें बड़े शामिल थे तो बच्चों को भी कुछ पाने की ललक थी। ऐसा दृश्य नजर आया, जिसमें प्रतिमाओं के साथ आस्था का विसर्जन भी हुआ।
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विसर्जन में पूजा समिति के युवकों का पूजा-पाठ से ज्यादा जोर नाचने-गाने पर था। शहर के केदारनाथ जायसवाल बताते हैं कि रात 12 बजे घोषणा हुई कि जिन्हें नाचना है, वे आकर नाच लें। फिर एक साल बाद ही मौका मिलेगा। फिर क्या था दो मिनट में आरती, पूजा-पाठ की औपचारिकता निपटाकर सभी नाचने-गाने में जुट गए।
श्रद्धालु करीब आधे घंटे के बाद प्रतिमा को घाट पर ले गए। वहां बने प्लेटफाॅर्म से सीधे पोखरे में गिरा दिए। शहर के अशोक मिश्र ने बताया कि उन्होंने ज्योंहि पूजन सामग्री पानी में डाला, दो बच्चों पानी में कूद पड़े। उन्होंने नारियल उठा लिया और चुनरी भी निकाल ली। चंद रुपयों के लालच में घाट पर दिन भर डेरा डालने वाले बच्चे तो प्रतिमाओं के बीच कूड़े की तरह अवशेष उपयोगी सामान निकाल रहे थे। बातचीत में उन्होंने बताया कि गगरी 10 रुपये में बिक जाएगी।



डूबने से लिया सबक, क्रेन से किया विसर्जन



शोहरतगढ़ में बुधवार रात 10 बजे के बाद प्रतिमाओं का विसर्जन हुआ। भोर तक प्रतिमाएं विसर्जित होती रहीं। क्रेन के माध्यम से प्रतिमाएं विसर्जित की गईं। एक दिन पहले ही कठेला क्षेत्र के सोनबरसा घाट पर किशोर की डूबने से मौत हो गई थी। पूजा समिति के युवाओं ने नाचने-गाने में ज्यादा समय बिताया। मार्ग में रोमांचक करतब भी दिखाए, जबकि घाट पर गए चंद समय में आरती की, उसके बाद क्रेन ने ट्राॅली से प्रतिमाओं का उठा लिया।

जैसे ही प्रतिमाएं पानी में डाली गईं, वैसे ही प्रतिमाओं और कलश सहित अन्य पूजन सामग्री को लूटने की होड़ मची गई। प्रतिमाओं का सामान और रुपये निकालने के लिए एक-दूसरे से जूझते देखे गए।

दूसरे दिन बृहस्पतिवार को भी पानी में रुपये और शृंगार के सामान की तलाश में बड़े और बच्चे लगे हुए थे। पूजन सामग्री भी पैरों तले रौंदी जाती रही।

क्षेत्र की आरती व सुलेखा ने बताया कि विसर्जन के दौरान पोखरे और नदी में बच्चे गोते लगाते हैं। चंद रुपये पाने के लालच में बच्चों में लड़ाई भी हो जाती है। अगनू ने कहा कि साफ-सुथरे कपड़े हैं। इसका उपयोग लोग घरेलू कार्यों में करते हैं। प्रतिमाओं के साथ अच्छी साड़ियां भी मिल जाती हैं।









लोगों की सोच पर दिखावा हावी, इसे बदलने की जरूरत



प्रतिमा को स्थापित करने से लेकर विसर्जन तक पूजा पद्धति है। एक दशक पहले तक श्रद्धा पूर्ण विसर्जन का रिवाज हमने देखा है। लेकिन, अब शोरगुल और दिखावा सोच बन गई है। लोगों के लिए मौज-मस्ती ज्यादा अहम हो गई है। यह सब अज्ञानता के चलते हैं। लोग यह तक नहीं सोचते हैं कि जिस माता की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा कर पूजते हैं और उसी मां को किस तरह तालाब और पोखरे में गंदे के बीच फेंक दे रहे हैं। उचित परंपरा के अनुसार विसर्जन करना चाहिए। यह सब देखकर मन खिन्न हो जाता है।

-घनश्याम गिरी, महंत, पल्टा देवी मंदिर

घाट पर नहीं छोड़नी चाहिए पूजन सामग्री

मां दुर्गा की प्रतिमाओं के संग लोग पूजन सामग्री, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं और धार्मिक पुस्तकें ले जा रहे हैं। विसर्जन के बाद प्रतिमा के साथ सारा सामान कूड़े की तरह फैला दिया जा रहा है। नौ दिनों तक जिनकी पूजा हुई, उन्हें पैरों से रौंदा जा रहा है। यहां पूजा-पाठ के बाद लोगाें ने नदी में प्रतिमा गिरा दी। पूजा-पाठ का सामान घाट पर ही छोड़ देना चाहिए, जबकि स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पूजन सामग्री को जिन्होंने घाट पर ही छोड़ दिया तो समझिए कि वे आस्था का विसर्जन कर रहे हैं।

-आचार्य दिव्यांशु, संचालक श्री सिंहेश्वरी मंदिर





प्रतिमाएं, शोरगुल, दिखावा सब आस्था पर भारी.. श्रद्धा भाव से करें विसर्जन



माता की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा जब करते हैं तो माना जाता है कि प्रतिमा जीवित रूप में विराजमान हो जाती है। हमें प्रतिमा का विसर्जन यानी कि माता की अंतिम विदाई भी विधि-विधान से ही करना चाहिए। जिस तरह माता-पिता को अंतिम विदाई देते हैं, उसी प्रकार पूरी श्रद्धा के साथ रस्म को निभाना चाहिए। संस्कारविहीन पूजा-पाठ अर्थहीन होता है। लेकिन, लोग विसर्जन के समय यह सब भूल जा रहे हैं। ऐसे लोगों को सोच बदलनी होगी। अगर विधि-विधान से प्रतिमाएं विसर्जित नहीं कर पाते हैं तो प्रतिमा स्थापित नहीं करनी चाहिए।
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-डॉ. आभा द्विवेदी, असिस्टेंट प्रोफेसर, संस्कृत



शास्त्रों में विसर्जन की यह है प्रक्रिया



शास्त्रीय विधि के अनुसार प्रतिमा पंचमहाभूतों से बनी होती है। इसलिए इसे पंच महाभूतों में विलीन कर देना ही विसर्जन है। शास्त्रों में इसकी प्रक्रिया है। प्रतिमाएं दुर्गा की हो या गणेश की, पानी में लेकर उतरते हैं। फिर धीरे-धीरे जल में अर्पित कर देते हैं। विसर्जन के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि प्रतिमा खंडित न हो। प्रतिमाएं बड़ी नहीं, श्रद्धा का बड़ा होना जरूरी है। शास्त्रों में जिस तरह से प्रतिमाओं के विसर्जन की पद्धतियां हैं वैसा विसर्जन कर ही नहीं रहे हैं। ज्यादातर लोगों में आस्था नहीं बल्कि दिखावा करने की होड़ लगी हुई है। वह चाहते हैं कि उनकी प्रतिमा श्रेष्ठ हो, जिसका नतीजा है कि अब इतनी बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं स्थापित कर देते हैं कि उनका विसर्जन ठीक तरीके से नहीं हो पाता। जिस प्रतिमा को नौ दिनों तक मां के रूप में पूजते हैं, उसी मां को गंदे जल में डालने के बाद यह तक नहीं देखते कि उनकी प्रतिमा जल में घुली या नहीं। सिर्फ प्रतिमाओं को विसर्जन की जगह फेंककर चले आते हैं। यह बिल्कुल गलत है।

-पं. रामभेज मिश्र, ज्योतिर्विद
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