धेंसा। भगवान ने कहा कि प्रह्लाद जैसी भक्ति हो तो उसे मेरा ही स्वरूप समझो, यह विचार राधेश्याम शास्त्री महाराज ने सिरवत आयोजित कथा में सोमवार की रात कही।
उन्होंने कहा कि भक्ति भाव व प्रेम हो तो वंश और जाति गौण हो जाती है। पुराण इतिहास नहीं है। पुराण महाकाव्य है। पुराण में जो हुआ है, वह कभी हुआ है ऐसा नहीं, वरन सदा होता रहता है। तो पुराण में किसी घटनाओं का अंकन नहीं है, वरन किन्हीं सत्यों की ओर इंगित है।
पुराण शाश्वत है। ऐसा कभी हुआ था कि नास्तिक के घर आस्तिक का जन्म हुआ। ऐसा नहीं सदा ही नास्तिकता में ही आस्तिकता का जन्म होता है। सदा ही और होने का उपाय ही नहीं है। आस्तिक की तरह तो कोई पैदा हो ही नहीं सकता। पैदा तो सभी नास्तिक की तरह होते हैं। फिर उसी नास्तिकता में आस्तिकता का फूल लगता है। तो नास्तिकता आस्तिकता की मां है, पिता है। नास्तिकता के गर्भ से ही आस्तिकता का आर्विभाव होता है। इसके आगे भी कथा रसपान कराया। इस दौरान गोपेश्वर चौबे, शशिकुमार शुक्ल, प्रसून शुक्ल, अजय कुमार शुक्ल आदि मौजूद रहे।