निर्यात बंद होने से कम हो सकता है कालानमक चावल का भाव
-कालानमक धान की खेती करने वाले किसान कर रहे महंगाई की चर्चा
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। जिले में ओडीओपी में शामिल कालानमक चावल का निर्यात बंद हुआ तो किसानों की चिंता बढ़ गई है। एक तो किसानों को तरक्की की उम्मीद टूटी है, दूसरे महंगाई के दौर में कालानमक चावल का भाव गिरने से किसानों काे नुकसान होने की आशंका है।
किसानों के अनुसार कालानमक की परंपरागत प्रजाति के धान की खेती में एक बीघा में 11 से 12 हजार रुपये लागत आती है, जबकि सूखे के हालत में कई बार सिंचाई करनी पड़ी तो लागत बढ़ जाती है। किसान फंसी हुई पूंजी को बचाने की कोशिश में महंगा डीजल खरीदकर सिंचाई कर घाटे की स्थिति में चला जाता है। एक बीघा खेत में करीब तीन क्विंटल चावल और एक क्विंटल 80 किग्रा चावल निकलता है। यदि इसमें किसान को एक बीघा में 6 से 7 हजार रुपये बचने की संभावना रहती है। यह कीमत 100 रुपये प्रति किलो की दर से हिसाब से होती है। वर्तमान दौर में कालानमक चावल 100 से 120 रुपये किलो बिक रहा है। निर्यात बंद होने से लागत कम हुई तो किसानों के लिए घाटे का सौदा हो जाएगा। 100 रुपये लीटर डीजल खरीदकर सिंचाई की जाए तो एक बीघा फसल में एक बार में 600 से 800 रुपये खर्च हो जाते हैं। सूखे की स्थिति में एक सप्ताह में ही फसल सूखने लगती है।
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ऐसे समझें लागत
खेत की जुताई व लेवा- 1300 रुपये
बीज- 2000 रुपये
रोपाई की मजदूरी- 2000 रुपये
उर्वरक- 1000 रुपये
निराई-2000 रुपये
कटाई- 800 रुपये
सामान्य स्थिति में सिंचाई- 3000 से 4000 रुपये
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देर हो जाती है गेहूं की फसल
कालानमक की पुरानी डंठल वाली प्रजाति में चावल का स्वाद व सुगंध बेहतर होता है। इसे तैयार होने में 160 से 170 दिन लगता है, जबकि सामान्य प्रजाति 135 से 140 दिन में तैयार हो जाती है। कालानमक धान की कटाई दिसंबर में होती है। कटाई के दौरान नमी अधिक रहती है और इस कारण गेहूं की बुवाई में देर होती है और पैदावार कम होती है।
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किसानों का दर्द
कालानमक चावल की ब्रांडिंग मार्केटिंग से कीमत बढ़ी, यहीं कारण है कि कालानमक की खेती हो पा रही है। महंगाई के कारण कालानमक की खेती में लागत बढ़ गई है। यदि भाव गिरा तो कालानमक धान की लागत निकलना मुश्किल हो जाएगा।
-मणिकांत मणि त्रिपाठी, महुलानी
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जलवायु के असंतुलन में बारिश कम हुई तो कालानमक की खेती में नुकसान होता है। निर्यात शुरू होना चाहिए। कीमत गिरी तो कालानमक का रकबा कम हो जाएगा। कालानमक धान की खेती पर विशेष अनुदान मिलना चाहिए। इसके नुकसान का मुआवजा भी सामान्य धान की तुलना में तीन गुना होना चाहिए।
श्रीधर पांडेय, तेतरी बुजुर्ग, उसका