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Siddharthnagar News: कालानमक का निर्यात बंद हुआ तो सस्ता बेचने को मजबूर हैं किसान

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काला नमक धान की फसल
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कालानमक चावल की कीमत हुई कम, किसानों को खेती करना हुआ कठिन
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पिछले दो सालों में निर्यात अधिक होने से बढ़ा कालानमक धान का रकबा

संवाद न्यूज एजेंसी



सिद्धार्थनगर। चावल का निर्यात बंद हुआ तो कालानमक की खेती करने वाले किसानों की तकलीफ बढ़ गई है। कीमत और मांग में गिरावट हो गई है। किसानों के घर रखा हुआ चावल नहीं बिका है, जबकि धान की फसल तैयार करने में पूंजी की संकट आ रही है। कालानमक चावल की कीमत में गिरावट से कालानमक धान की खेती करने वाले किसानों की स्थिति खराब हो गई है। समस्याएं बरकरार रही तो अगले सत्र में कालानमक चावल का रकबा भी कम हो सकता है।

भारतीय चावल के निर्यात पर 23 जुलाई को प्रतिबंध लग गया। उसके बाद नेपाल में चावल की मांग बढ़ने लगी है, लेकिन नियमों के आगे किसानों का चावल नहीं बिक पा रहा है। नेपाल में भी भारतीय चावल के आयात की मांग उठ रही है, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली है। भारत ने भूटान, मालदीव सहित तीन देशों में चावल का निर्यात शुरू किया, जबकि इसमें नेपाल शामिल नहीं है। नेपाल में चावल की कमी हो गई है। जिले के किसान निर्यात शुरू करने की मांग कर रहे हैं। इसी बीच
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नेपाल सरकार ने 1.55 लाख टन खाद्यान्न मांगा है। यदि निर्यात की छूट मिले तो चावल की कीमत बढ़ जाएगी और किसानों की सेहत सुधर जाएगी।





गिरी कीमत, ढूंढे नहीं मिल रहे ग्राहक



चावल का निर्यात बंद हुआ तो कालानमक चावल की कीमतों में गिरावट आई है। किसानों का दर्द है कि कालानमक धान या चावल बिका नहीं, अब खेती की लागत के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ रहा है। शाेहरतगढ़ के किसान तिलकराम पांडेय ने बताया कि निर्यात बंद होने से एक क्विंटल चावल पर 2 से 3 हजार रुपये नुकसान हो रहा है। पिछले साल लंबी डंठल वाला चावल 12000 रुपये से घटकर 9000 रुपये क्विंटल और शोध के बाद इजाद की गई लंबी डंठल 7000 से घटकर 6000 रुपये क्विंटल हाे गई है। उनके गांव में ही 100 क्विंटल चावल नहीं बिक पाया है, किसान परेशान हैं कि खेती कैसे करें।

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निर्यात बंद और हो गया प्रमोशन कम

कालानमक धान की खेती करने वाले श्रीधर पांडेय ने बताया कि जलवायु असंतुलन के कारण कालानमक की खेती की लागत बढ़ गई है। यह प्रजाति 160 से 170 दिन में तैयार होती है, इसमें सामान्य तौर पर 4-5 बार सिंचाई करनी होती है। बारिश कम हुई तो सिंचाई अधिक करनी पड़ रही है और लागत अधिक हो रही है। निर्यात बंद हुआ हुआ ही है, प्रशासन भी पहले की तरह कालानमक चावल का प्रमोशन नहीं कर रहा है।





निर्यात शुरू नहीं हुआ तो टूट जाएंगे किसान



कालानमक चावल की सीएफसी के निदेशक अभिषेक सिंह ने कहा कि निर्यात शुरू नहीं हुआ तो किसान टूट जाएंगे। कालानमक चावल के ग्राहक कम हो गए हैं। वर्ष2018 में ओडीओपी में शामिल कालानमक धान का रकबा 15 हजार हेक्टेयर से अधिक हो गया है, लेकिन घाटा होगा तो इसकी खेती नहीं हो पाएगी। अप्रैल 2023 में उन्होंने 100 क्विंटल चावल सिंगापुर भेजा, जिसे जिलाधिकारी संजीव रंजन ने झंडी दिखाई थी।





बासमती से महंगा होता है कालानमक का निर्यात

कृषि वैज्ञानिक डॉ. आरसी चौधरी का कहना है कि बासमती चावल का निर्यात 96 रुपये प्रति किलो है, जबकि कालानमक चावल का निर्यात 106 रुपये प्रति किलो की दर से हुआ था। वर्ष 2022 में 550 टन कालानमक चावल सिंगापुर, नेपाल व दुबई में भेजा गया था , जबकि वर्ष 2023 में भी 200 क्विंटल निर्यात हुआ। निर्यात शुरू था तो मुंबई,दिल्ली व अन्य शहरों में जाने वाला चावल वहां से निर्यात होता था। उन्होंने केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में पत्र लिखकर चावल को तीन वर्ग में बांटने की सिफारिश की है। जिसमें बासमती और गैर बासमती है, जिसे बासमती, विशिष्ट चावल और साधारण चावल करने की आवश्यकता है। विशिष्ट चावल में उत्तर प्रदेश के कालानमक सहित असम को जोहा, बंगाल को गोपाल भोग, बिहार की कतरनी सहित देश के विभिन्न अंचल के 12 प्रजाति के चावल शामिल हो सकते हैं।
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वर्जन



जिले में कालानमक चावल ओडीओपी में शामिल है, इसके प्रोत्साहन के लिए निर्यात आवश्यक है। इस मामले में शासन को पत्र भेजा गया है। कालानमक चावल के प्रोत्साहन के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

संजीव रंजन, जिलाधिकारी
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