तुलसियापुर। एकांत के मंदिर में बैठने पर हृदय सरोवर में प्रभु प्रेम का कमल खिल उठता है। अनंत ब्रह्म की भक्ति में डूबना सर्वोत्तम कला है। जब असहाय हृदय की आह प्रार्थना बन जाती है, तो सुदूर दिखने वाला परमात्मा बिल्कुल निकट हो जाता है।
उक्त विचार श्रीमद्भागवत कथा में कथा व्यास शास्त्री राजदेव पांडेय ने बुधवार को बढ़नी ब्लाॅक के औदही कलां में प्रवचन करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि क्षणभंगुर का आकर्षण हमें साधना के पथ से भटका देता है। मनुष्य के जीवन में आशा सबसे बड़ा बंधन है। प्रभु के प्रेम से आंदोलित हृदय अनंत परमात्मा के आंगन में नृत्य बन जाता है। धर्म का एकमात्र प्रयोजन जागरण है। अतुल कृष्ण महाराज ने कहा कि हमें संसार से पलायन नहीं, अपितु मन का रूपांतरण करना है। सत्य सर्वत्र उपलब्ध है, जिसने खोजा उसे प्राप्त हुआ।
बुधवार को कथा में भक्ति की महिमा, गोकर्ण जी की कथा, श्रीमद्भागवत का महात्म्य, भगवान के 24 अवतार एवं राजा परीक्षित को शृंगी ऋषि के श्राप का प्रसंग सभी ने श्रद्धा से सुना। इस अवसर पर मुख्य यजमान राजेंद्र प्रसाद शुक्ल, गंगाराम तिवारी, अजय वरुण, रामदेव गुप्ता, शिवपूजन विश्वकर्मा, शहंशाह आलम, शिशिर मिश्र, मयंक शुक्ल, राहुल शुक्ल, रामकुमार शर्मा आदि मौजूद रहे।