जिले में हर वर्ष तबाही मचाती है बाढ़ बांधों के मरम्मत का नहीं शुरू हुआ कार्य
10 दिन में सक्रिय हो जाएगा मानसून, नहीं भरे गए बांधों होल
जिले में हर साल कई स्थानों पर बांध टूटने की वजह से बाढ़ मचाती है तबाही
बाढ़ से प्रभावित होती है जिले की 60 प्रतिशत आबादी
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। नेपाल बाॅर्डर से सटे जनपद में बाढ़ एक बड़ी समस्या है। बारिश के साथ ही नेपाल से निकलने वाली नदियों से सैलाब आने से जनपद का 60 प्रतिशत हिस्सा बाढ़ की गिरफ्त में आ जाता है। छह नदी और नालों से आने वाले पानी से कई दिनों तक बाढ़ की स्थिति बनी रहती है। बांध टूट जाते हैं। घरों में पानी भरने से लोगों को बांध पर शरण लेनी पड़ती है। बाढ़ से निपटने के लिए जिले में 454 किलोमीटर लंबी 39 बांधों पर हर वर्ष मरम्मत की बात की जाती है। करोड़ों खर्च होते हैं, फिर भी हालात हर साल बिगड़ती है।
15 जून से मानसून के सक्रिय होता है और बारिश शुरू हो जाती है। प्रशासन की ओर से बाढ़ की तैयारी शुरू कर दी गई। बाढ़ से निपटने का दावा किया जा रहा है। बाढ़ से बचाव के लिए बांध पर क्या इंतजाम किया गया है। इसकी पड़ताल की गई तो स्थिति चिंताजनक मिली और तस्वीर चौंकाने वाली थी। क्योंकि बांधों में होल बने हैं, रैट होल हैं। वहीं कुछ स्थानों पर तो लंबे समय से गैप ही नहीं भरा गया है। जबकि इसी होल में पानी का दबाव बढ़ने के बाद तेजी से कटते हैं तो बांध टूटने से बाढ़ के हालात उत्पन्न हो जाते हैं। तीन सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित वाले क्षेत्र के बांध की पड़ताल में खामियां ही खामियां नजर आईं।
स्थानीय लोगों का कहना था कि जब बाढ़ तबाही मचाती है और बारिश शुरू होती है तो होल भरने का कार्य शुरू किया जाता है। अगर पहले तैयारी कर ली जाए तो शायद यह नौबत ही न आने पाए।
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अगर राप्ती ने तरेरी आंख तो फिर, बाढ़ मचाएगी तबाही
डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के किसानों के लिए सबसे बड़ी समस्या बाढ़ की है। हर साल राप्ती नदी के बाढ़ में सैकड़ों एकड़ धान की फसल बर्बाद होती है। वहीं, बाढ़ के दौरान जनहानि के साथ ही महीनों रहन सहन की समस्या बढ़ जाती है। बाढ़ की समस्या से निजात दिलाने के लिए करीब 43 किमी शाहपुर-भोजपुर बांध के निर्माण का काम पिछले करीब एक दशक से चल रहा है, जो अभी तक पूरा नहीं हुआ। शाहपुर-भोजपुर बांध का निर्माण पूरा नहीं होने से लोगों में अक्तूबर 2022 में आए भीषण बाढ़ की तबाही का मंजर याद कर सहम जाते हैं। अभी भी बांध अधूरा है, जहां है वहां होल है। ऐसे में इस साल भी बाढ़ का दंश लोगों को झेला पड़ेगा।
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यहां है शाहपुर भोजपुर बांध में गैप
भनवापुर ब्लॉक व इटवा, डुमरियागंज तहसील क्षेत्र से होकर जाने वाली शाहपुर-भोजपुर बांध में बिजौरा, भरवलिया, चंदनजोत, वीरपुर, पिकौरा, भरवठिया बाजार, डुमरिया, फत्तेपुर, मछिया मुस्तहकम, पेंड़ारी मुस्तहकम गांव के पास कहीं एक किमी तो कहीं पांच से छह सौ मीटर का गैप है। लोगों का कहना है कि अगर समय रहते बांध का गैप भरकर निर्माण का काम पूरा नहीं हुआ तो बाढ़ फिर एक बार तबाही मचा सकती है।
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बांध में होल के साथ ही गैप, तबाही मचाएगा बाढ़
कूड़ा नदी पर बनी उसका महदेवा बांध का निर्माण 2008-2009 में हुआ बांध अभी तक पूरी तरह से तैयार नहीं है। बर्रोहिया खालसा से सोहांस बाजार दूरी लगभग तीन किलोमीटर है, जिसमें 5 गैप हैं। बाढ़ आने पर इन्हीं गैप से बाढ़ का पानी भर जाता है। वहीं, कई स्थानों पर होल है। बांध दरक गया है। जिसके टूटने से जिससे किसानों की हजारों एकड़ खेती जलमग्न हो जाती है। इससे मदरहना, बर्रोहिया खालसा, बुजबुजवा, लक्ष्मीनगर, गनेरा, बिलासपुर, सिसहनिया, फुलवरिया, खजुरिहा, श्रीरामपुर, तेनुहवा बिशुनपुर सहित 30 से अधिक गांव के लोग प्रभावित होते हैं।
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बानगंगा नदी के बांध में कई जगह रैट होल
नेपाल से निकलने वाली बानगंगा नदी के पास बसे नाकाही, नईडर सहित अन्य गांवों में हर साल बाढ़ की तबाही से लोग जूझते हैं। बारिश और नदी के उफान होने के बाद बांध टूटने और काटे जाने का खतरा बढ़ जाता है। बांधों में होल और रैट होल होने के कारण हर साल रिसाव के बाद टूटता है। लेकिन सुरक्षा से संबंधित कार्य नहीं किया जाता है। मौजूदा नकाही गांव के पास बांध कई जगह जर्जर है। इसी प्रकार बरैनिया गांव के पास होल होने के कारण दहशत है। नईडहर गांव निवासी जैसराम ने कहा कि हर साल बाढ़ से जूझते हैं। बांध पर कोई काम नहीं होता है। कमल ने कहा कि हम लोगों का गांव बांनगगा नदी के किनारे बसा हुआ है। बरसात के समय यहां पर कटान होने लगती है। यहां पर बाढ़ हमेशा आता है और हम लोग रतजगा करके बांध की सुरक्षा करते है।
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बाढ़ का पानी भर जाने के कारण पूरे गांव के लोगों को रोजमर्रा के सामानों के लिए तरसना पड़ता है। यदि किसी के घर पर माचिस खत्म हो जाती है तो वह भी नहीं मिल पाती है।
-रामसुमेर लोधी, श्रीरामपुर
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बांध बने लगभग 15 वर्ष का समय बीत गया है लेकिन अभी तक पांचों गैप भरे नहीं गए हैं। अगर इसकी जांच कराई जाए तो इसमें बिना काम कराए ही भुगतान लेने वालों की पोल खुलेगी।
-विक्रम, स्थानीय निवासी
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हर साल बाढ़ की तबाही का मंजर झेलना आदत सी बन गई है। बाढ़ के दौरान जहां रहन सहन में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वहीं, मेहनत की गाढ़ी कमाई खर्च कर धान के फसल को लगाते है, जो एक झटके में बाढ़ सारे अरमानों पर पानी फेर देता है। अगर बांध का निर्माण कार्य पूरा हो जाए तो बहुत बड़ी समस्या का समाधान हो जाए।
-फजल मालिक, निवासी पेंड़ारी मुस्तहकम
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गांव के करीब से होकर जाने वाली राप्ती नदी हर साल तबाही मचाती है। बाढ़ में हर साल धान की खड़ी फसल सड़ जाती है। जिसका मुआवजा के नाम पर दी जाने वाली धनराशि नाकाफी होती है। अक्टूबर 2022 में आए बाढ़ का तांडव देख पिछले साल धान नहीं लगाया और बाढ़ भी नहीं आई। पिछले कई वर्षों से बांध का निर्माण हो रहा है, जो अब तक पूरा नहीं हो सका।
-प्रमोद तिवारी, निवासी जूड़ीकुइयां