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Siddharthnagar News: सर्वेक्षण होता तो प्रमाणित हो जाता गनवरिया का कुआं

Wed, 29 Nov 2023 11:28 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
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-केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने एक सिंतबर को दिया था सिद्धार्थनगर में सर्वेक्षण का आदेश
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-गनवरिया स्तूप से 50 मीटर स्थित कुआं देखने पहुंचे विशेषज्ञ, उत्खनन की मांग
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। तथागत बुद्ध की धरती सिद्धार्थनगर में पुरातात्विक सर्वेक्षण होता तो गनवरिया स्तूप से 50 मीटर स्थित प्राचीन कुएं के सहित अन्य धरोहरों की प्राचीनता प्रमाणित हो जाती। केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने एक साल पहले जिले के सभी गांवों में पुरातात्विक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था, लेकिन यह कार्य शुरू ही नहीं हो सका। विशेषज्ञों का मानना है कि पुरातत्व धरोहरों की प्राचीनता प्रमाणित होगी तो शोध व विकास का रास्ता खुलेगा।
अमर उजाला में गनवरिया से 50 मीटर दूर प्राचीन कुआं होने की खबर प्रकाशित हुई तो पुरातत्व विशेषज्ञ डॉ शरदेंदु त्रिपाठी मौके पर पहुंचे और उन्होंने कुएं की प्राचीनता के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि गनवरिया स्तूप के पास कुएं का उत्खनन करने की आवश्यकता है।कपिलवस्तु क्षेत्र में पिपरसन, पंचगावां, गरगजवा आदि टीलों का अवैध उत्खनन कर अपने हजारों साल पुराने इतिहास के पुरातात्विक स्रोतों को बचाया जा सकता है ।
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वास्तव में कपिलवस्तु का यह क्षेत्र जो आमतौर पर बौद्ध काल से सम्बंधित है, यदि यहां पुरातात्विक स्रोतों पर विधिवत कार्य हो , तो इसका इतिहास बौद्ध काल से भी हजारों वर्ष प्राचीन हो सकता है । इसकी प्राचीनता सिद्ध करने के अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं । इस पूरे क्षेत्र में व्यापक पुरातात्विक सर्वेक्षण विधिवत उत्खनन तथा अध्ययन से अतीत के गौरवशाली पृष्ठ उभरकर सामने आएंगे। इन पुरास्थलों के समीप स्थित खेतों, आवासीय संरचनाओं, बाग-बगीचों आदि से अक्सर प्राचीन अवशेष मिलते रहते हैं। अतः इनके व्यापक पुरातात्विक सर्वेक्षण की आवश्यकता है ।




प्राचीन टीलों के गर्भ में दबे हैं महत्वपूर्ण अवशेष
कपिलवस्तु परिक्षेत्र के गनवरिया का राज प्रसार के बगल में एक कुआं मिला है, जो रिंग बेल है। उत्तर भारत में रिंग बेल कुआं की परंपरा मौर्य काल से माना जाता है, जो राउंड कुआं था, इससे पहले नदी के किनारे ही आबादी बसती थी, लेकिन रिंग बेल कुआं बनने से अन्य स्थानों पर भी लोग बसने लगे। गनवरिया के आस-पास भी पुराने धरोहर मिलते हैं, जिससे आस-पास के जगहों को भी सुरक्षित करने की जरूरत है, गनवरिया पुरा क्षेत्र पुरात्तविक ढंग से भरा हुआ है, गनवरिया के चहारदीवारी के बाहर भी संरक्षण करने की जरूरत है, जिससे काफी महत्वपूर्ण साक्ष्य पाषाण काल, पूरा बौद्ध काल, मौर्य काल के समय का महत्वपूर्ण साक्ष्य खोजा जा सकता है। इसका सर्वेक्षण करने की जरूरत है, वैज्ञानिक ढंग से इसका सर्वेक्षण होने से इसके पूराने धरोहरों को संरक्षित किया जा सकता है।





कपिलवस्तु का भारतीय परिक्षेत्र ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है । इसका इतिहास यहां के अनेक स्मारकों तथा टीलों के गर्भ में आज भी दबा है । कपिलवस्तु , गनवरिया , पिपरीकोट, पिपरासन, पंचगावां,गरगजवा आदि इनमें प्रमुख हैं । इनमें से कपिलवस्तु,गनवरिया, पिपरीकोट का उत्खनन कर इसे चहारदीवारी से घेर दिया गया । सालारगढ़ को उत्खनन करके यूं ही छोड़ दिया गया । चूंकि, यह पूरा क्षेत्र की पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है इसलिए पुरास्थलों के इन चहारदीवारी से बाहर भी पुरावशेष मिलते रहते हैं ।
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- डॉ. शरदेंदु त्रिपाठी, असिस्टेंट प्रोफेसर, प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, सिविवि
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इस प्रकार हुआ था सर्वेक्षण का आदेश
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु के पास लाला पंचगवां स्थित प्राचीन टीले में डेढ़ साल पहले जेसीबी से मिट्टी खुदाई हो रही है। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. नीता यादव ने प्राचीन टीले के संरक्षण के लिए पीएमओ को मेल किया। अमर उजाला में प्राचीन धरोहरों को संरक्षित करने की मुहिम चलाई। उसके बाद केंद्रीय पुरातत्व विभाग के राज्य मुख्यालय ने जिले के सभी गांवों में पुरातात्विक सर्वेक्षण का आदेश दिया।
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