प्लेटफार्म पर पड़ रहा पाला, फिर भी यात्री प्रतीक्षालय में ताला
कड़ाके की ठंड में भी रेलवे के अफसरों का यात्रियों के प्रति गैरजिम्मेदाराना व्यवहार
रैनबसेरा की सुविधा, लेकिन नगर पालिका का रेलवे से समन्वय नहीं, खुले में सोते मिले यात्री
रात 11 से 12 बजे तक रेलवे स्टेशन पर सुविधाओं की हुई पड़ताल तो खुली पोल
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। रेलवे स्टेशन पर सुविधाएं होने के बावजूद यात्रियों को नसीब नहीं हैं। खून जमा देने वाली सर्द रात में यात्री प्लेटफार्म और खुले आसमान के नीचे सोने या ट्र्रेनों का इंतजार को मजबूर हैं। अमर उजाला ने रात 11 से 12 बजे तक यात्री सुविधाओं की पड़ताल की तो यह हकीकत सामने आई।
रात के रिपोर्टर ने देखा कि रेलवे स्टेशन और प्लेटफार्म पर पाला पड़ने जैसी स्थिति है, लेकिन खुले में सो रहे हैं। यात्री प्रतीक्षालय में ताला लटका है। जो खुले हैं वे बैठने लायक स्थिति में नहीं हैं। रैन बसेरा है, लेकिन प्रचार प्रसार के अभाव में उसकी उपयोगिता साबित नहीं हो रही। यह स्थिति बताती है कि जिला संसाधनों की वजह से कम, अफसरों की कार्यशैली और उनके गैरजिम्मेदाराना व्यवहार की वजह से अधिक पिछड़ा है। आप भी पढ़िए रिपोटर्।
सीन-1
प्लेटफार्म नंबर एक पर टिनशेड के नीचे एक बेंच पर कई यात्री बैठे थे। नींद आने पर बनियाडीह के संजय सिंह टिनशेड से आगे खुले आसमान के नीचे बेंच पर कंबल ओढ़कर लेट गए। उन्होंने बताया कि लखनऊ जाना है। यात्री प्रतीक्षालय बैठने लायक नहीं है। रैन बसेरा के बारे में कई लोगों से पूछा लेकिन कोई बता नहीं पाया। उनसे कुछ दूरी पर कंबल ओढ़कर बैठे हुए बर्डपुर के रमेश कुमार और अशफाक ने बताया कि यात्री प्रतीक्षालय पर उस वक्त ताला लगा था। उन्हें भी रैन बसेरा के बारे में जानकारी नहीं है।
सीन-2
सामान्य श्रेणी के यात्री प्रतीक्षालय की हकीकत परखी गई तो पता चला यहां दीवारें गंदी हैं। खिड़कियों के शीशे गायब हैं। इस कारण हवा आती रहती है। यहां बैठे बर्डपुर के अब्दुल नसीम और चिल्हिया के खुर्शीद अहमद ने बताया कि हवा के साथ कोहरा भी आ जाता है। इसकारण यहां कोई बैठना पसंद नहीं करता। यह कभी कभी ही खुलता है। किसी को खुला मिल गया तो आ गया, नहीं मिला तो कोई दूसरा ठौर तलाशता है।
सीन-3
आरक्षित श्रेणी के यात्रियों के लिए बने प्रतीक्षालय में महिलाओं के कक्ष में ताला लटक रहा था। अकेले या बच्चों के साथ सफर कर रहीं महिलाओं को भी पुरुष कक्ष में ही रुकना पड़ता है। पुरुष कक्ष की हालत भी बहुत अच्छी नहीं मिली। यहां कुल चार बेंच रखे मिले। अक्सर यहां बैठने की वजह नहीं मिली। फर्श इतनी गंदी थी कि कोई चादर बिछाकर बैठने की हिम्मत नहीं कर सकता। एक यात्री ने बताया कि इस पर ताला लगा था। विश्रामालय खोलने के लिए कोई कर्मचारी नहीं था। स्टेशन मास्टर के कक्ष में जाकर खुलवाना पड़ता है। वह भी वहां के कर्मचारियों की मर्जी पर निर्भर करता है।
सीन-4
रेलवे स्टेशन के गेट के पास बाहर की ओर खुले आसमान के नीचे दुधमुंहे बच्चों के साथ तीन परिवारों के लोग सो रहे थे। जहां कुछ देर ठहरने में ही ठंड लग रही थी, वहां पर ये लोग रात बिताने के लिए मजबूर थे। पटना के रहने वाले मुकेश, पिंटू व भोरू ने बताया कि सिद्धार्थनगर में वे सड़क बनाने आए थे। काम हो गया तो सीतापुर जा रहे थे। सोने की जगह मिली तो वे बाहर ही रुक गए।
जहां से करना है प्रवेश, वहीं लिखा है निषेध
रेलवे स्टेशन परिसर के एक कोने में 15 बेड का रैन बसेरा बनाया गया है, लेकिन नगर पालिका का रेलवे से समन्वय नहीं है। इस वजह से यात्रियों को इसकी जानकारी नहीं हो पाती। रेलवे भी यात्री सुविधा के लिए इसकी घोषणा नहीं करता। नगर पालिका ने यहां नि:शुल्क रैन बसेरा होने का प्रचार प्रसार नहीं किया है। रेलवे कॉलोनी में प्रवेश निषेध के बोर्ड पर ए-फोर साइज के पेपर पर रैन बसेरा लिखा है, जो आसानी से दिखाई नहीं पड़ता। एक कर्मचारी ने बताया कि एसडीएम ने एक सप्ताह पहले रैन बसेरा में पांच बेड बढ़ाने के निर्देश दिए थे। मगर बेड बढ़ाने और लोगों को बताने का काम नहीं हुआ है।
आंच के इंतजार में सहते रहे ठंड
रेलवे स्टेशन पर अलाव के पास रुककर यात्री व ऑटो चालक आंच के इंतजार में ठंड सहते नजर आए। एक यात्री ने बताया कि लकड़ी नम होने के कारण जल ही नहीं रही है। यात्री राज और अजय ने भी कुछ देर आग जलने का इंतजार किया। फिर चाय की दुकान पर चले गए। स्टेशन के सामने स्टॉल लगाने वाले सुनील और अख्तर ने भी अलाव की लकड़ी पर सवाल उठाए।
वर्जन
यात्री प्रतीक्षालय को और बेहतर बनाने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों से वार्ता हुई है। टिकट के आधार पर मांग करने वाले यात्रियों के लिए आरक्षित श्रेणी का विश्रामालय खोला जाता है। रैन बसेरा रेलवे का नहीं है, इस कारण उद्घोषणा नहीं की जा सकती है।
आरएस शर्मा, स्टेशन मास्टर
पिछले साल जहां रैन बसेरा बना था, इस बार भी वहीं बनाया गया है। सुविधाओं के बारे में जानकारी ली जाएगी। कोई कमी होगी तो उसे दूर करके सुविधाएं बेहतर की जाएंगी।
मुकेश कुमार चौधरी, ईओ, नगर पालिका परिषद