सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज के संयुक्त जिला अस्पताल की इमरजेंसी में मरीजों को बाहर की दवाइयां लिखी जा रहीं हैं। अस्पताल के कर्मचारी बताते हैं कि एंटीबायोटिक और कॉटन तक नहीं हैं। आप दवा नहीं खरीदेंगे तो आपके मरीज का इलाज नहीं हो पाएगा।
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि इमरजेंसी में दवाइयों की कमी नहीं है। इमरजेंसी में भर्ती मरीजों को निजी मेडिकल स्टोर की दवा लिखने में कुछ कर्मचारियों की साठ गांठ है, जिसमें कमीशन के लिए दवा लिखने का खेल सामने आ रहा है। इमरजेंसी में एंटीबायोटिक इंजेक्शन अधिक मरीजों को लिखा जा रहा है, जिसकी कीमत 380 रुपये है। अस्पताल में बाहर की दवा लिखने के कारण विवाद भी हो रहा है, लेकिन सक्रिय दलालों पर अंकुश नहीं लगाया जा रहा है।
बिना डॉक्टर के सलाह के ही लिखी थी दवा
मेडिकल कॉलेज में एक माह पहले एक आउट सोर्स कर्मी ने एक मरीज को दवा लिखी थी, शिकायत हुई तो उसकी जांच में आरोप की पुष्टि हुई। प्रभारी प्राचार्य डॉ. एके झा ने आउट सोर्स एजेंसी को पत्र लिखकर कर्मचारी को हटाने के लिए कहा है।
गए थे मदद करने, खरीदनी पड़ी दवा
शहर के रोवापार में रहने वाले सुनील मणि त्रिपाठी ने बताया कि मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी में रविवार सुबह वे हादसे में घायल एक व्यक्ति की मदद करने गए थे। एक कर्मचारी ने बताया कि कॉटन नहीं है तो उन्होंने कॉटन खरीदकर लाया। उसके बाद एंटीबायोटिक भी खरीदने पड़ी। डेढ़ घंटे में उन्होंने 970 रुपये की दवा खरीदी तो इलाज हुआ।
395 रुपये की दवा खरीदी
अहिरौली के आनंद ने बताया कि उनके पिता जगदीश सड़क पर अचानक आ गई बकरी को बचाने की कोशिश में बाइक से गिर गए थे। खेत के किनारे लगे कटीले तार से उनके गले के पास घाव बन गया। इमरजेंसी में टिटबैक इंजेक्शन नहीं था तो खरीदकर लाया।एंटीबायोटिक इंजेक्शन भी खरीदनी पड़ी। सरकारी अस्पताल में इलाज कराने पर भी 395 रुपये खर्च हो गए।
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इमरजेंसी में बाहर की दवा लिखने के मामले में शिकायत हुई थी तो आउट सोर्स कर्मी को सेवा से निकालने की कार्रवाई की गई है। जिन लोगों को बाहर की दवा लिखी जा रही है, उन्हें शिकायत करनी चाहिए। अस्पताल में दवाएं पर्याप्त हैं।
-डॉ. एके झा, प्रभारी प्राचार्य
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