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Siddharthnagar News: मोबाइल गेम की धांय-धांय को जीवन में उतार रहे बच्चे

Mon, 22 May 2023 12:46 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
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सिद्धार्थनगर। मोबाइल के इस्तेमाल से बच्चों का मनोविज्ञान काफी प्रभावित हो रहा है। बच्चे वर्चुअल (आभासी) और वास्तविक दुनिया में भेद नहीं कर पा रहे हैं। वे जैसा गेम या वीडियो में देख रहे हैं। वैसा ही जीवन में भी करने की कोशिश कर रहे हैं।
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बच्चों को डांट की बोली बंदूक की गोली के जैसी लग रही है। इससे वे इतने अक्रामक हो जा रहे हैं कि तत्काल प्रतिक्रिया देने से नहीं चूक रहे हैं। जैसा कि शनिवार को शिवनगर डिडई थाना क्षेत्र के सेमरहना गांव में देखने को मिला। यहां अपने से छह वर्ष अधिक आयु के लड़के की कही बात 13 साल के बच्चे को इतनी नागवार गुजरी कि उसने पिता की लाइसेंसी बंदूक से सामने वाले पर फायर झोंक दिया। गनीमत रही कि गोली हाथ की कलाई को छूकर चली गई। थोड़ी इधर-उधर होती तो जान भी जा सकती थी।
मनोविज्ञान विषय के विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिकता से बच्चे सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं और उनकी मानसिकता बदल रही है। इसके पीछे कहीं न कहीं मोबाइल गेम और उसपर दिखने वाले कई वीडियो हैं। क्योंकि अधिकांश बच्चे उसी में डूबे हुए हैं। जिनके दिलो-दिमाग पर वही छाया रहता है। जिसे सामान्य जीवन में भी करने की उनकी इच्छा प्रबल रहती है। इसलिए वह इस प्रकार के घातक कदम उठाने से नहीं चूक रहे हैं। ऐसा न हो इसके लिए अभिभावकों को जागरुक होनी की जरूरत है। जिससे इस प्रकार की घटनाएं रुक सकती हैं।
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बच्चों पर पड़ रहा है मोबाइल का नकारात्मक प्रभाव
बच्चे और किशाेरों में अपराध की प्रवित्ति के पीछे कहीं न कहीं मोबाइल फोन बड़ा कारण है। क्योंकि वह मोबाइल पर घंटों गेम देखते हैं। जो गेम देखते हैं, उसमें भी गोली मरने वाला अधिक रहता है। जो उनके दिलाे-दिमाग पर हावी हो जाता है। वह कल्पना करते हैं कि हम सामान्य जीवन में ऐसा कर सकते हैं। जब कभी ऐसा होता तो वह अपराध कर बैठते हैं। दूसरा पहलू यह है कि जब व्यक्ति कमजोर होता है तो सामने वाले से टकराता नहीं है। लेकिन, जब उसके पास कुछ होता है तो वह गुस्से में कुछ भी कर सकता है। जैसा की गोली चलाने वाली घटना हुई है। ऐसे में मोबाइल बच्चों को कम से कम प्रयोग करने के लिए दें। साथ ही अगर असलहा रखते हैं तो ऐसी जगह पर रखें जो उनकी पहुंच से दूर रहे।
- डॉ.नरेंद्र शर्मा, सहायक आचार्य मनोविज्ञान विभाग, सिद्धार्थ विश्वविद्यालय सिद्धार्थनगर

बाल न्यायालय तय करता सजा
16 वर्ष की उम्र से कम के अगर किशोर अपराध करते हैं तो उसमें अपराध के हिसाब से बाल न्यायालय की ओर से सजा दी जाती है। इसमें गंभीर अपराध जैसे हत्या, दुष्कर्म के मामले में अधिकतम तीन वर्ष की सजा का प्रावधान है। यह इसलिए कि उनके जीवन में सुधार हो सके और दोबारा अपराध न करें। फिलहाल अगर कोई भी व्यक्ति असलहा रखता तो उसे सुरक्षित रखे जो परिवार और बच्चों की पहुंच से दूर रहे। क्योंकि घटना घटित होने के बाद असलहे का लाइसेंस निरस्त होने के साथ ही कई प्रकार की कार्रवाई का प्रावधान है।
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- संजय कुमार श्रीवास्तव, वरिष्ठ अधिक्ता जनपद न्यायालय सिद्धार्थनगर
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