- माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में भी खून के दलालों की है गहरी पैठ
- मेडिकल कॉलेज प्रशासन और पुलिस ने एक-दूसरे पर लगाया दलालों को छोड़ने का आरोप
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज के संयुक्त जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में एक दिन पहले शनिवार को पकड़ी गई खून की दलाली में कोई कार्रवाई नहीं की गई। मेडिकल कॉलेज प्रशासन और पुलिस ने एक-दूसरे पर पल्ला झाड़ लिया। इस कारण हर बार की तरह इस बार भी खून का सौदा करने वाले दलाल बच निकले। अस्पताल में भी चर्चा हो रही है कि इतनी लचर से व्यवस्था से ढीठ हो चुके दलालों पर अंकुश कैसे लग पाएगा।
ब्लड बैंक में निजी अस्पताल में भर्ती मरीज को चढ़ाने के लिए खून बेचने महराजगंज से आए डोनर के पकड़े जाने पर खून की दलाली का खेल सामने आया। ब्लड बैंक में पूछताछ शुरू हुई तो दो दलाल बचाव में उतर गए। कुछ देर बाद ही पुलिस पहुंची ताे वे मौका देखकर भाग निकले। इस मामले में 5000 रुपये के बदले ब्लड देने आए डोनर से माफीनामा लिखवाकर छोड़ दिया गया, जबकि इसके पहले भी कई बार इस तरह के केस सामने आ चुके हैं।
आमने -सामने
ब्लड बैंक में खून की दलाली पकड़ी गई तो डोनर को पुलिस के सुपुर्द कर दिया। पुलिस ने उससे माफीनामा लिखवाकर छोड़ दिया। किसी ने तहरीर नहीं दी। डॉक्टर के सामने भी सुरक्षा की चुनौती है। वह किससे-किससे दुश्मनी करेगा। पुलिस को अपनी शक्ति का प्रयोग करके डोनर के माध्यम से दलालों को पकड़ना चाहिए।
-डॉ. एके झा, प्रभारी प्राचार्य
कोट
ब्लड बैंक में खून का दलाल पकड़े जाने की सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची थी। आरोप के मामले में तहरीर मांगी गई, लेकिन तहरीर नहीं मिलने से कार्रवाई नहीं की जा सकी। डॉक्टरों ने कहा कि वह गरीब है, उसे माफीनामा लिखवाकर छोड़ दिया जाए तो पुलिस ने छोड़ दिया। बिना तहरीर के कार्रवाई कैसे की जाती।
-सतीश सिंह, कोतवाल सदर
दान मिले खून की हो रही दलाली
रक्तदान शिविर में लोग रक्तदान करते हैं ताकि रक्त के बिना गंभीर मरीजों के इलाज में संकट न आए। लोग जरूरतमंदों की जान बचाने के लिए रक्तदान करते हैं, लेकिन अपनी घुसपैठ से दलाल ब्लड बैंक खाली कर दे रहे हैं। रक्तदान होता है तो सभी ग्रुप के रक्त पर्याप्त मात्रा में हाेते हैं, लेकिन कुछ समय बीतते ही ब्लड बैंक खाली हो जाता है। ब्लड बैंक में 15 सितंबर को 17 यूनिट खून हो गया तो गंभीर मरीजों की जान बचाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। 30 सितंबर को 104 यूनिट खून हो गया था तो रविवार को 77 यूनिट पर सिमट गया। रविवार को चार यूनिट खून फ्री दिया गया। जेएसवाई, थैलेसीमिया एवं एचआईवी पॉजिटिव के इलाज में फ्री में खून देने का नियम है।
खून माफिया का डॉक्टरों से गठजोड़
मेडिकल कॉलेज में कुछ ऐसे खून माफिया भटक रहे हैं, जिनकी चिकित्सकों से काफी बनती है। उनका गठजोड़ इतना तगड़ा है कि मरीज निजी अस्पताल में भर्ती हैं और मेडिकल कॉलेज की डिमांड तैयार करवाकर ब्लड बैंक से खून लेकर सौदा कर देते हैं। इसमें कई लोगों की सांठगांठ है। ऐसे मामले पकड़ में तो आ चुके हैं, लेकिन विभागीय स्तर से कार्रवाई नहीं हो पाई। इसकी वजह से खून का सौदा करने वालों माफिया का दखल बढ़ रहा है। स्वास्थ्य कर्मियों की भी इस दलाली में भूमिका है, लेकिन दलालों का नेटवर्क तोड़ने की कोशिश होती नजर नहीं आ रही है।
महिला ने चीखकर कहा कि यहीं के लोगों ने 15 हजार लिए
ब्लड बैंक में दलाली पकड़े जाने पर खून की दलाली चर्चा में आ गई है। रविवार को ब्लड बैंक के बाहर एक कर्मचारी ने 15 हजार रुपये में एक यूनिट खून बेचे जाने की बातें की तो सुनने वाले लोग चौंक गए। कुछ दिन पहले ही एक मरीज को रेफर किया जा रहा था। उसके शरीर में रक्त की कमी थी और गंभीर बीमारी के कारण इलाज संभव नहीं था। पीड़ित महिला ऐसे परेशान थी कि उसने आपा खो दिया। चीख-चीखकर कहने लगी कि अब कहां से खून लाऊं। यहीं के स्टाफ ने एक यूनिट खून दिलाया, जिसके 15 हजार रुपये देने पड़े। महिला बांसी क्षेत्र की रहने वाली थी। मरीज की हालत गंभीर थी। इसलिए उसे लेकर गोरखपुर गई, उसने कोई शिकायत नहीं की।
इमरजेंसी के पास ताक में रहते हैं खून माफिया
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े एक शख्स ने बातचीत में बताया कि अस्पताल में काम करने वाले कुछ लोग हैं, जो खून की खरीद-फरोख्त करते हैं। ये लोग कभी-कभी परिचित और मरीज का रिश्तेदार बताकर प्राचार्य के पास पहुंच जाते हैं। उन्हें गुमराह करके आदेश करवा लेते हैं। उसी का मरीज से 10-15 हजार रुपये ले लेते हैं। निशुल्क का कार्य माह में चार से पांच बार करते हैं। इसके साथ ही ये लोग घूमकर ऐसे लोगों को फंसाते हैं, जिन्हें खून की अति आवश्यकता होगी है। उनसे बात-बात में समस्या जानते हैं। इसके बाद डोनर लाकर खून देने की बात करते हैं। फिर सौदा शुरू होता है। जब बात बन जाती है तो डोनर को बुलाते हैं। उन्हें एक यूनिट पर पांच से छह हजार देते हैं। जबकि नौ से दस हजार रुपये अपने ले लेते हैं। इन बिचौलियों पर कार्रवाई नहीं होती है। क्योंकि ये केवल सौदा करते हैं। कभी-कभार ही ब्लड बैंक जाते हैं।