घर का बेटा हो या फिर परिवार चलाने वाला वह जिम्मेदार, जिसके भरोसे पूरा परिवार होता है। हादसे में मौत किसी एक की नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार के अरमानों की होती है। परिवार के सामने आर्थिक तंगी होती है तो किसी बाप का बेटों को ऊंचाई पर देखने के अरमानों का कत्ल हो जाता है। अपनों को गंवा चुके लोगों की पीड़ा जानने की जब कोशिश की गई तो उनकी आंखें नम हो गईं। हर तरफ से एक ही जवाब आता है, सच मानिए पूरी जिंदगी ही उजड़ जाती है। खुशी का कोई मौका ऐसा नहीं होता है, जब यादों की वजह से गम का माहौल न हो जाए। हर मौके पर सिर्फ याद आती है और फिर खुशी..खुशी ही नहीं रह जाती है।
बेटे को इंजीनियर देखना चाहते थे अकील...अब बदहवास है
गोरखनाथ के जाहिदाबाद निवासी अकील की कपड़े की दुकान है। वह नहीं चाहते थे कि उनकी तरह ही उनका बेटा सिर्फ व्यापार ही करें। वह बेटे को इंजीनियर बनाना चाहते थे। उसकी हाईस्कूल की परीक्षा चल रही थी। रविवार रात में अकील की गोरखनाथ में हिट एंड रन कांड में मौत हो गई। बेटा इतना बदहवास हो गया कि वह सोमवार सुबह परीक्षा देने ही नहीं जा रहा था लेकिन घरवालों ने उसे उसकी पिता की चाहत का याद दिलाया और किसी तरह से भारी मन से बेटा परीक्षा देने के लिए गया। अब भी बेटे फरहान की हालत ठीक नहीं है। वह बदहवास सा खुद को अपने कमरे में बंद रखता है। घरवाले उसे समझा रहे है, दोस्त भी घर पर आकर संभालने की कोशिश करते है, लेकिन वह अब भी इस सदमे से उभर नहीं पाया है। भतीजा सैफ बताता है, चाचा अक्सर ही शहर के बाहर व्यापार के सिलसिले में जाया करते थे लेकिन, भाई की परीक्षा की वजह से वह दिल्ली नहीं गए। उस दिन चाचा खलीलाबाद गए थे, उन्हें देरी हो गई, लेकिन फिर भी वह बेटे की पढ़ाई की वजह से ही रुके नहीं। रात में ही आ गए और फिर दोस्त मोइन के साथ टहलने चले गए। परिवार के लोगों की आंखें डबडबा जा रही थी।
सोचा था बेटा दरोगा बनेगा...दौड़ने ही तो गया था, लेकिन सब खत्म हो गया
25 फरवरी को पिता के अरमानों को ही पूरा करने की कसम खाए विशाल (21) दौड़ लगाने के लिए सुबह निकला था। वह रोज ही दौड़ने जाता था, क्योंकि दरोगा भर्ती की तैयारी कर रहा था। लेकिन, उस दिन लौट कर घर नहीं आया। एम्स इलाके में हाइवे पर ही एक कार में टक्कर मारने के बाद सड़क किनारे दौड़ लगा रहे विशाल को भी रौंद दिया और मौके पर ही मौत हो गई। जवान बेटे को गंवा चुके पिता उदयभान आज भी सदमे है। घटना का जिक्र करते ही उनकी आंखें डबडबा गई। बोले, जवान बेटे का जाना क्या होता है, कोई मुझसे पूछे। सोचा था कि जीवन में जो खुद नहीं कर पाया है, वह बेटा करेगा। कहीं पूरी संगत में न पड़ने पाए। इसलिए प्राइवेट नौकरी छोड़कर किसानी करने लगा। हमेशा उसे समझाता था कि कभी विवाद मत करना, अगर एक छोटा सा भी केस हो गया तो फिर जिंदगी तबाह हो जाएगी। बेटा भी मेरी बातों को माना, सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन एक दिन हुई घटना ने सब कुछ उजाड़ दिया। विशाल का छोटा भाई विकास भी भाई को भूल नहीं पा रहा है। मां उषा देवी की आंखें ही पथरा गई है। आज भी गांव की महिलाएं आकर उन्हें किसी तरह से संभालती है। लेकिन, अचानक ही वह बोल पड़ती है, देखो विशाल आ रहा है। परिवार वाले किसी तरह से समझा रहे हैं।