नोमोफोबिया के शिकार हो रहे हैं आजकल के युवा
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। आभासी दुनिया में मोबाइल फोन के बिना जीना मुश्किल है। कहते हैं कि हर समस्या का समाधान फोन में छिपा है, लेकिन अब युवाओं को इस फोन के दूर हो जाने का डर सता रहा है। इस मनोस्थिति को नोमोफोबिया (नो मोबाइल फोबिया) कहते हैं।
यह ऐसा मानसिक विकार है जिसमें फोन की बैटरी कम होने, नेटवर्क चले जाने व फोन के इधर-उधर हो जाने से व्यक्ति को बेचैनी होने लगती है। एक अध्ययन के मुताबिक 53 फीसदी स्मार्टफोन यूजर इससे पीड़ित हैं। इसमें युवाओं की संख्या ज्यादा है। मेडिकल कॉलेज के साइकोलॉजी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. अफजल खान बताते हैं कि आज कल हर चौथा व्यक्ति नोमोफोबिया का शिकार है। इसमें इंसान इतना संवेदनशील हो जाता है कि बार-बार फोन के नोटिफिकेशन को ही चेक करता है। चार्जिंग के समय भी फोन इस्तेमाल करता है। शुरुआती दौर में कुछ आदतों में बदलाव कर इससे बचा जा सकता है। आगे जाकर साइकोलॉजिस्ट की मदद लेनी पड़ सकती है। लोग धीरे-धीरे फोन में सबकुछ सेव करते जा रहे हैं। जरूरी दस्तावेज, बैंक अकाउंट संबंधित जानकारी आदि भी फोन में होती है। इसलिए वह अपना फोन किसी अन्य को देने से झिझकते हैं। आधुनिकता बढ़ने से इसका दुरुपयोग भी आसान हो गया है।
इन बातों का रखें ध्यान
-रात को सोते समय मोबाइल फोन को पास न रखें।
-किताबें पढ़ने की आदत डालें। फोन में किताबें न पढ़ें।
-सुबह उठते ही फोन को चेक करने से बचें।
- खेलकूद और व्यायाम करें।
-अलार्म व समय देखने के लिए फोन का प्रयोग न करें।
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ये हैं प्रमुख लक्षण
-फोन में कोई समस्या होने पर घबराहट होना।
-फोन के इस्तेमाल से सिर भारी होना।
-हर समय फोन को अपने हाथों में रखना।
-फोन इधर-उधर होने पर पसीना आना।
-फोन के न मिलने पर धड़कन तेज हो जाना।