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Siddharthnagar News: चढ़ावा देंगे तो ही पैतृक संपत्ति चढ़ेगी आपके नाम

Tue, 16 May 2023 11:21 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
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सिद्धार्थनगर। अगर पिता अथवा माता की मौत हो गई तो इस दुखद स्थिति में भी वारिस को राजस्व अभिलेख में पैतृक संपत्ति (भूमि, मकान आदि) पर नाम दर्ज कराने के लिए चढ़ावा देना होगा। अगर पांच से 10 हजार रुपये चढ़ावा नहीं दिया तो नियमानुसार आवेदन करने के बाद भी तहसील के चक्कर काटते रह जाएंगे, लेकिन आपका नाम नहीं चढ़ेगा। जिले की पांचों तहसीलों में ऐसे 1500 से अधिक मामले है जिनमें आवेदक वरासत कराने के लिए राजस्वकर्मियों के पास दौड़ रहे हैं।
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पहले नियम था कि अगर किसी की मृत्यु हो जाती थी तो उसकी तेरहवीं के दिन ही संबंधित क्षेत्र का लेखपाल वरासत कर मृतक के वारिसों को खतौनी उपलब्ध कराता था। वर्ष 2004 में राजस्व अभिलेखों के कंप्यूटराइज्ड प्रक्रिया के तहत खतौनी भी कंप्यूटराइज्ड हो गई। इसके बाद भी मृतक के वरासत का दायित्व संबंधित लेखपाल ही पर था। इस बीच कई ऐसे मामले रहे जहां संबंधित क्षेत्र के राजस्वकर्मियों की लापरवाही से वरासत के सैकड़ों मामले आठ से 10 वर्ष तक लंबित रहे। दो वर्ष पूर्व वरासत के लिए शुरू हुई ऑनलाइन आवेदन करने की प्रक्रिया पारदर्शी तो है लेकिन जटिल हो गई। ऑनलाइन आवेदन करने के बाद भी अगर आवेदनकर्ता ने चढ़ावा नहीं दिया तो वरासत प्रक्रिया कागजों में ही उलझी रहेगी और आवेदनकर्ता को तहसील के चक्कर लगाते रहना पड़ेगा।

वरासत दर्ज होने की यह है प्रक्रिया
किसी की मृत्यु होती है तो भूमि, मकान संबंधी राजस्व अभिलेख में उसके वारिस (पत्नी, पुत्र व अविवाहित पुत्री) का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज होता है। इसके लिए वारिस को मृत्यु प्रमाण पत्र एवं परिवार रजिस्टर की नकल संलग्न कर ऑनलाइन आवेदन करना होता है। इसके बाद यह आवेदन लेखपाल के पास आता है। आवेदक को आवेदन की प्रति एवं साक्ष्य लेखपाल को देना होता है, जिसकी जांचकर रिपोर्ट लेखपाल राजस्व निरीक्षक को भेजता है। राजस्व निरीक्षक इस पर मृतक के स्थान पर उसके वारिस को वरासत करने का आदेश देता है। जिसके बाद संबंधित भूमि राजस्व अभिलेख (खतौनी) में वारिस का नाम दर्ज हो जाता है। अलग-अलग राजस्व ग्रामों में भू-संपत्ति की वरासत के लिए प्रत्येक राजस्व ग्राम का अलग-अलग आवेदन करना होता है।
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ऐसे होता है खेल
वरासत के ऑनलाइन आवेदन के निस्तारण के लिए 21 दिन का समय होता है, लेकिन कई ऐसे मामले हैं जो छह माह अथवा एक वर्ष से अधिक समय से लंबित हैं। इनमें मृतक की मृत्यु तिथि के लिए मृतक प्रमाण पत्र और वारिस तय करने के लिए परिवार रजिस्टर की नकल की मांग की जाती है। इसके साथ ही आवेदक से आधार कार्ड की छाया प्रति मांगी जाती है। इन अभिलेखों में कमियां दिखाते हुए अथवा अधिकारियों की असहमति बताते हुए आवेदक को कई बार दौड़ाया जाता है, फिर चढ़ावा मिलने पर वरासत कर दिया जाता है। चढ़ावा नहीं मिला तो आवेदक को तहसील का चक्कर लगाना पड़ेगा।

कई पुराने मामले हैं लंबित
ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया शुरू होने से पूर्व मृतक की भू-संपत्ति वरासत नहीं करा पाने वाले वारिसों को अब भी तहसील के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। कारण, पहले मृतकों का प्रमाणपत्र नहीं बनता था, अब आॅनलाइन आवेदन में मृत्यु की तिथि दर्ज करनी होती है, जिससे इसकी जरूरत पड़ रही है। ऐसे में मृतक प्रमाण पत्र नहीं होने से कई पुराने मामले है जहां वरासत के लिए लोग आठ से 10 वर्षों से चक्कर लगा रहे हैं। उसका क्षेत्र के छितरापार निवासी बेकारू राम कहते हैं कि वरासत के लिए उन्हें आठ वर्ष तक चक्कर लगाना पड़ा। कभी यह अभिलेख चाहिए और अभिलेख मिलने पर उसमें त्रुटि बताकर टाल दिया जाता रहा।

केस एक : बर्डपुर नंबर 12 के निवासी ओंकार यादव ने बताया कि उनकी मां के नाम से बर्डपुर में जमीन थी, तीन वर्ष पूर्व मां की मौत के बाद उस भूमि का वरासत करा खतौनी में अपना नाम दर्ज कराने के लिए ऑनलाइन आवेदन किया। लेकिन आवेदन के दो वर्ष बाद भी वरासत नहीं हो सका और न ही खतौनी में उनका नाम दर्ज हुआ। उनका कहना है कि कभी कोई कागज तो कभी दूसरा अभिलेख मांग उन्हें टरकाया जाता रहा है।

केस दो: डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के बिजवार बढ़ई गांव निवासिनी उदयराजी ने वर्ष 1998 में अपने पुत्री के पुत्रों राजन, पेशकर व संतोष कुमार पुत्रगण बाल मुकुंद पांडेय को रजिस्टर्ड वसीयत कर दी थी। उदयराजी की मृत्यु के बाद विपक्षियों ने अपत्ति दाखिल कर दी। यह मामला तहसीलदार कोर्ट में लंबित है, जिस पर हर तारीख को पीड़ितों का चक्कर लगाना पड़ता है, लेकिन वर्षों बाद भी वरासत मामले का निर्णय नहीं हो सका।

केस तीन : शोहरतगढ़ तहसील क्षेत्र के औदही कलां निवासी राहुल शुक्ल ने बताया कि उनके बाबा के नाम से कुछ जमीन गांव में पड़ी है जिसके वरासत के लिए उनके पिताजी ने भी काफी प्रयास किया लेकिन नहीं हुआ। अब उनके पिता की भी मृत्यु हो चुकी है, जिसके बाद वह भी तहसील के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन अभी तक वरासत नहीं हुई और वह जमीन उनके नाम पर दर्ज नहीं हो सकी है।
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वरासत संबंधी मामलों को लंबित रखना लापरवाही है, इसका समयबद्ध त्वरित निस्तारण होना चाहिए। लंबित मामलों की जांच करा दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी।

- जयेंद्र कुमार, प्रभारी जिलाधिकारी
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