सिद्धार्थनगर। जिले में आठ माह में 66 प्रसूताओं की मौत हुई है। इनमें ज्यादातर मौत लापरवाही के कारण हुई है। मैटरनल डेथ ऑडिट में लोगों में जागरूकता की कमी के साथ स्वास्थ्य विभाग की कमजोरी व लापरवाही सामने आ रही है। जितनी मातृ मृत्यु हुई है, उनमें से एक तिहाई प्रसव घरेलू हैं, जबकि आशा कार्यकर्ताओं एवं स्वास्थ्य कर्मियों के माध्यम से संस्थागत प्रसव के अभियान चलाए जा रहे हैं।
सिद्धार्थनगर में एक अप्रैल से 30 नवंबर तक 66 प्रसूताओं की मौत हुई है। औसतन हर माह आठ महिलाएं दम तोड़ रही हैं। उनकी मौतों की ऑडिट रिपोर्ट लोगों को सचेत करने वाली है। घरेलू प्रसव के दौरान तबीयत बिगड़ने पर डॉक्टर उपलब्ध नहीं हाेना भी मौत का सबसे बड़ा कारण है, जबकि गर्भावस्था में जांच नहीं होने के कारण प्रसव के दौरान सही प्रबंधन नहीं हो पाया है।
जिला प्रशासन ने गंभीरता से लेते हुए सभी एफआरयू (प्रथम रेफरल इकाइयां) में सिजेरियन डिलीवरी शुरू करा दी है, जबकि डिलीवरी प्वाइंट को भी सक्रिय किया जा रहा है। डिलीवरी प्वाइंट की व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को उनके मनचाहे स्थान से हटाकर वहां भेजा जा रहा है, जिस स्वास्थ्य केंद्र पर प्रशिक्षित कर्मियों का अभाव है। जिले में 103 डिलीवरी प्वाइंट बनाने गए हैं, जबकि सभी 14 ब्लाॅकों में हर माह एक नया डिलीवरी प्वाइंट बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। जिला परामर्शदाता प्रमोद कुमार संत ने बताया कि मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए प्रसव के दौरान हुई सभी मौत की जांच की जा रही है। यदि कोई व्यक्ति प्रसव के दौरान मौत होने की सूचना देता है तो उसके 1000 रुपये प्रोत्साहन राशि दी जा रही है।
मौतों की स्थिति... संख्या
घरेलू प्रसव - 21
मेडिकल कॉलेज- 7
सरकारी अस्पताल 13
रास्ते में मौत- 7
निजी अस्पताल- 6
मेडिकल कॉलेज गोरखपुर- 12
मौतों के प्रमुख कारण
-प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव
-प्रसूता के शरीर में अत्यधिक खून की कमी
-प्रसव के दौरान झटके आना
-गर्भवस्था में जांच नहीं होने से प्रसव के दौरान समस्याएं
-अधिक समय तक प्रसव पीड़ा
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एफआरयू में हुई सिजेरियन डिलीवरी
एफआरयू- सिजेरियन डिलवरी
उसका- 14
मिठवल- 41
बेवां- 16
शोहरतगढ़- 18
इटवा- 39
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डॉक्टरों को भेजकर कराते हैं डिलीवरी
आठ माह में 18,073 प्रसव हुए हैं, जिनमें 800 सिजेरियन डिलीवरी हुई है। 103 डिलीवरी प्वाइंट में 70 की स्थिति ठीक है, जबकि अन्य स्थानों पर रिपोर्ट सुधारने की कोशिश की जा रही है। स्वास्थ्य विभाग में छह स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं तीन निश्चेतना विशेषज्ञ हैं। अब इन डॉक्टरों को आवश्यकता के अनुसार सीएचसी में बनी एफआरयू (फर्स्ट रेफरल यूनिट) में भेजा जा रहा है, इन पांचों यूनिट में ऑपरेशन थियेटर है, जबकि जिले में माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज ही एक ऐसा अस्पताल है, जहां 24 घंटे प्रसव की सभी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं।
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डॉक्टरों की राय
प्रसव के दौरान मृत्यु पर नियंत्रण के लिए लोगों को जागरूक होने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य कर्मियों एवं आशा कार्यकर्ताओं के कहने के बावजूद भी कुछ लोग संस्थागत प्रसव के सूचना नहीं देते हैं। यदि पहले से नियमित जांच की जाए और संस्थागत प्रसव हो तो मौत का जोखिम बहुत कम हो जाता है। प्रसव के दौरान या बाद में ज्यादा खून गिरता है तो मरीज को सबसे पहले अस्पताल ले जाना चाहिए। कुछ महिलाएं तब अस्पताल पहुंचती है, जब उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ चुकी होती है।
डॉ. रामनिवास, स्त्री रोग विशेषज्ञ, मिठवल
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खून की कमी है तो ज्यादा गिरेगा खून
एनीमिया की चपेट में आने वाली महिलाओं का प्रसव होता है तो उनके शरीर में तेजी से खून गिरता है। जिनके शरीर में खून कम होता है तो उनके खून में थक्क जमने की क्षमता कम होती है। प्लेसेंटा सही जगह पर नहीं होने, यूटेरस फट जाने या प्लेसेंटा का फिंगर जैसा हिस्सा यूटेरस में घुस जाने सहित अन्य कारणों से खून अधिक गिरता है। गर्भावस्था के दौरान 4-5 बार डॉक्टर को दिखाना चाहिए और प्रसव डॉक्टर या प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी की निगरानी में ही होना चाहिए।
-डॉ. अनीता द्विवेदी, स्त्री रोग विशेषज्ञ
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वर्जन
संस्थागत प्रसव को बढ़ाने के लिए सभी एफआरयू में सिजेरियन डिलीवरी शुरू करा दी गई है। निर्देश दिए गए हैं कि सभी डिलीवरी प्वाइंट में औसतन एक माह में पांच डिलीवरी हो। अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाकर सभी 14 ब्लाॅक में हर माह एक डिलीवरी प्वाइंट बढ़ाए जाएंगे।
पवन अग्रवाल, जिलाधिकारी
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स्वास्थ्य विभाग में एफआरयू पर ही सिजेरियन डिलीवरी हो रही है, जबकि डिलीवरी प्वाइंट पर भी सुविधाएं दी जा रही है। लोगों को जागरूक किया जा रहा है कि संस्थागत प्रसव ही कराएं। विशेषज्ञ डॉक्टरों व प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की कमी के बावजूद भी मोबाइल वैन के माध्यम बेहतर सुविधाएं दी जा रही है। मातृ मृत्यु दर को कम करने की कोशिश की जा रही है।
-डॉ. एनके बाजपेयी, सीएमओ