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Siddharthnagar News: 400 बीघा सीलिंग की जमीन पर रसूखदारों का कब्जा, परियोजनाएं अधर में

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तहसील नौगढ़। संवाद
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सिद्धार्थनगर। जिले की चार तहसीलों में चार सौ बीघा से अधिक सीलिंग भूमि चिह्नित है, लेकिन इनके समेत अन्य गैर चिह्नित सीलिंग भूमि रसूखदारों के कब्जे में है। वहीं औद्योगिक क्षेत्र, पंचायत भवन, वाटरहेड टैंक व शौचालय समेत महत्वपूर्ण सरकारी परियोजनाएं जमीन की अनुपलब्धता के कारण अधर में लटकी हैं। अगर सीलिंग की इन जमीनों को कब्जामुक्त करा लिया जाए तो जिले में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं परवान चढ़ सकेंगी।
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केंद्र व प्रदेश सरकार की महत्वपूर्ण योजना में शामिल औद्योगिक निवेश के लिए जिले में कई बार इन्वेस्टर्स समिति का आयोजन हो चुका है, लेकिन अभी तक उद्यमों की स्थापना के लिए औद्योगिक क्षेत्र के लिए भूमि नहीं मिल सकी है। जबकि प्रशासन इसके लिए एकमुश्त सौ बीघा से अधिक भूमि की तलाश मेें छह माह से जुटा हुआ है। इसी तरह प्रदेश सरकार की सभी ग्राम पंचायतों में ग्राम सचिवालय स्थापना योजना के तहत जिले के 12 ग्रामों में भूमि नहीं होने से पंचायत भवन नहीं बन सके है। वहीं लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की योजना के तहत 50 से अधिक ग्रामों में वाटरहेड टैंक के लिए जगह की तलाश पूरी नहीं हो सकी है। ऐसे ही कई गांवों में भूमि नहीं मिलने से सामुदायिक शौचालय का निर्माण नहीं हो सका है। जबकि अकेले नौगढ़ तहसील में ही दो गाटों की सीलिंग भूमि का रकबा 210 बीघा से अधिक है। इनमें हरिदासपुर स्थित सीलिंग भूमि का क्षेत्र 15 हेक्टेयर अर्थात 120 बीघा और दूसरा तेतरी-सोंहास मार्ग पर पिठनी पुल के पास 90 बीघा सीलिंग भूमि का एक गाटा है। जिस पर रसूखदारों का कब्जा होने से अब तक इसे खाली नहीं कराया जा सका।

चार तहसीलों में चार सौ बीघा, बांसी में शून्य है सीलिंग भूमि
नौगढ़ तहसील में दो गाटा सीलिंग भूमि का रकबा 210 बीघा है, शोहरतगढ़ में डेढ़ सौ गाटे में बंटे 96 बीघा सीलिंग भूमि, इटवा में 80 गाटा की 40 बीघा भूमि, डुमरियागंज में सौ गाटे की 56 बीघा सीलिंग भूमि उपलब्ध है, जो वर्तमान में दूसरे के कब्जे में है। इन भूमियों के अलावा भी इन तहसीलों में सीलिंग भूमि की तलाश की जा रही है। जबकि बांसी तहसील में प्रशासन सीलिंग भूमि की तलाश नहीं कर सका है, जबकि इस तहसील में जिले के दो बड़े जमींदार घराने और एक राज घराने की भूमि स्थित है। अधिवक्ता अनिरुद्ध यादव कहते है कि सीलिंग भूमि चाहे कितने भी बड़े रसूखदार व्यक्ति के कब्जे में हो उसे खाली कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
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केस एक-
स्थगन आदेश की प्रति तलाश रहा प्रशासन
तेतरी-सोहांस मार्ग पर पिठनी पुल के पास के स्थित 90 बीघा सीलिंग भूमि की खतौनी में सुप्रीम कोर्ट के स्थगन आदेश का हवाला दर्ज है। प्रशासन कई वर्ष से इस सीलिंग भूमि की खतौनी में दर्ज कोर्ट के स्थगन आदेश की प्रति की तलाश में कई दिनों से जुटा है, लेकिन उसे अभी तक वह अभिलेख नहीं मिल सका है। प्रशासन को अस्पताल के लिए भूमि की तलाश थी, जिस दौरान इस सीलिंग भूमि पर निगाह पड़ी। यह भूमि एक बड़े जमींदार परिवार की रही है जो सीलिंग में निकली है, वह वर्तमान में सत्ताधारी दल से संबंधित है।

केस दो -
एडीएम कोर्ट में लंबित है सीलिंग भूमि की सुनवाई
बर्डपुर क्षेत्र के हरिदासपुर में 120 बीघा सीलिंग भूमि मामले में हाईकोर्ट ने 2002 में स्थानीय स्तर पर दूसरे पक्ष को सुनकर इसका निस्तारण करने का निर्देश दिया था, जो एडीएम कोर्ट में लंबित है। इस मामले में भू-स्वामी के पास 20 हेक्टेयर भूमि थी। जिसमें सीलिंग एक्ट के तहत पांच हेक्टेयर भूमि भू-स्वामी के पास छोड़कर शेष 15 हेक्टेयर भूमि सरकारी घोषित कर दी गई है। एडीएम उमाशंकर का कहना है कि मामले में संबंधित पक्ष को नोटिस जारी किया गया है, जल्द ही सुनवाई कर निस्तारण कर दिया जाएगा।

सीलिंग भूमि की बिक्री नहीं, हो सकता है सिर्फ पट्टा
जमींदारी प्रथा उन्मूलन के बाद 1961 में सीलिंग एक्ट लागू किया गया। कानून बनने के बाद एक परिवार को 15 एकड़ से ज्यादा सिंचित भूमि रखने का अधिकार नहीं है। असिंचित भूमि के मामले में यह रकबा 18 एकड़ तक है। सीलिंग में निकली सरकारी भूमि को बेचा नहीं जा सकता। इसे सिर्फ गरीबों को पट्टा किया जा सकता है। अकेले तहसील नौगढ़ क्षेत्र में सीलिंग की करोड़ों की कीमती सैंकड़ों बीघा जमीन अभी भी भू-माफिया के चंगुल में फंसी हुई है। जिन्हें स्थानीय राजस्वकर्मियों की मिलीभगत से लोगों को बेच दिया गया है।



सीलिंग भूमि की खरीद-बिक्री होती है शून्य

जमींदारी उन्मूलन एक्ट के तहत सीलिंग में निकली भूमि की बाद में की जाने वाली खरीद और बिक्री शून्य होती है। जांच में संबंधित भूमि अगर सीलिंग की पाई जाती है तो उसकी खतौनी में दर्ज नाम हटाने के साथ ही वह भूमि सरकारी हो जाती है। तहसीलदार नौगढ़ राम ऋषि रमन का कहना है कि जांच कर सीलिंग भूमि को खाली कराया जाएगा। संबंधित मामले की पूरी छानबीन के साथ ही दूसरे पक्ष के अभिलेखों की सत्यता जांच की जाएगी।


ऐसे बच सकते हैं सीलिंग भूमि की खरीद से

अधिवक्ता कृपाशंकर त्रिपाठी ने बताया कि भूमि के बारे में जानने के लिए खतौनी बड़ा आधार होती है। भूमि खरीदते समय क्रेता को खतौनी का ठीक से अध्ययन करना चाहिए। यदि खतौनी में संक्रमणीय भूमिधर दर्ज है, तो उस जमीन को खरीदा बेचा जा सकता है। हालांकि व्यवस्था में थोड़ा सुधार कर खतौनी में इसके साथ यह भी दर्ज हो जाए कि कितनी भूमि सीलिंग की है, तो खरीदार सचेत हो जाता है। सीलिंग की जमीन का पता लगाने के लिए सीएल-7 पंजिका को भी जांच लेना चाहिए। सीलिंग के सभी गाटे, इस पंजिका में दर्ज किए जाते हैं।


सभी सरकारी भूमियों से कब्जा हटवाने की कार्रवाई के साथ ही जिले की सभी तहसीलों में जांचकर सीलिंग भूमि चिन्हित कर उसे खाली कराने की कार्रवाई की जाएगी। इन सरकारी भूमियों का जन कल्याण के कार्यों के लिए उपयोग किया जाएगा।
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- संजीव रंजन, जिलाधिकारी
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