सिद्धार्थनगर। जोगिया क्षेत्र के अधिकांश गांवों में अभी भी बाढ़ के पानी से घिरा हुआ है। गांव पानी से घिरा होने के कारण बच्चे व महिलाएं बांध व छतों पर दिन गुजार रहे हैं। लखनापार गांव के लोग बांध पर शरण लिए हैं। नाव की कोई व्यवस्था नहीं होने के नाते कुछ लोग तैरकर तो कुछ ड्रम की नाव बनाकर बांध तक पहुंच रहे हैं। राहत सामग्री तो मिल गई मगर रोशनी कोई व्यवस्था अभी भी नहीं है। एक पैकेट मोमबत्ती मिली थी जो खत्म होने के बाद शाम होते ही सभी पन्नी से बने तबूं में सभी लोग घुस जाते हैं। वहीं, कई लोग संक्रामक बीमारी की भी चपेट में आ चुके हैं। लोगों का कहना है कि अगर नाव की व्यवस्था होती तो शायद हम बचने का कोई उपाय कर पाते। एनडीआरफ की टीम के जाने के बाद नाव नहीं आई है। जोगिया क्षेत्र के लखनापार बूढ़ी नदी पर पास बसा हुआ है। गांव पूरी तरह अभी भी सैलाब की जद में हैं। गांव में लगभग 100 घर हैं। यहां की आबादी लगभग 300 के आसपास है। शनिवार को गांव पड़ताल की गई तो समस्याएं से जुझते पाए गए। गांव के चारों तरफ दूर-दूर तक पानी है। लोग ड्रम की नाव बनाकर गांव से बाहर आ जा रहे थे। गांव के सभी घरों में अभी लगभग चार फिट पानी भरा हुआ है। महिलाएं व बच्चे बांध पर शरण लिए हैं। वहीं, गांव के कुछ लोग छत पर बैठे दिखे। गांव निवासी उपेंद्र कहते हैं कभी सोचा न था कि इस प्रकार की तबाही आएगी, जिसमें सब कुछ चला जाएगा। पानी में सब कुछ चला गया। पटरी पर जिंदगी कब लौटेगी कोई ठिकाना नहीं हैं। कुछ दिन पहले एनडीआरएफ की टीम आई थी, जिसमें नाव के सहारे के महिलाओं और बच्चों को निकाला गया था। प्रशासन की ओर से एक नाव की व्यवस्था नहीं की गई है, जिससे हम अपनी जरुरत की वस्तुओं को खरीद सके। ग्राम प्रधान बिक्रम कहते एक बार राहत सामग्री मुहैया कर दिया गया था। पांच दिन पहले एक-एक पैकेट मोमबत्ती दी गई थी। वह भी खत्म हो गई। शाम ढ़लते ही अंधेरा छा जाता है। हमेशा यह भय रहता है कि कोई जानवर बच्चों को काट न ले। अभी तक प्रशासन की ओर से केरोसिन तक नहीं दिया है। कम से कम पेट नहीं भर रहा है तो उजाले में तो रहे, जिसके सहारे रात कट जाए। भगवान ऐसी आपदा कभी न लाए। गांव की कलावती, मीना का कहना है कि सारा सामान घर में छूट गया है, किसी तरह से जान बचाकर बांध पर पहुंचे थे। साथ में कुछ चावल लाई थी वह भी भीग गया था। भीगा चावल वो भी आधा पेट खाकर जी रहे हैं। शौच करने के लिए अंधेरे का इंतजार करना पड़ रहा है। यही कहते-कहते दोनों फफक पड़ी। वहीं रामप्रसाद, गुड्ढू, भोलू आदि कहना था कि बाढ़ में सब कुछ छिन गया। पता नहीं कब पानी घटेगा और हम घरों को लौटेंगे।