श्रावस्ती। सावन बीत गया और मेघ इस साल भी सावन में किसानों को धोखा दे गए। एक तरफ जहां सावन में औसत की 35 प्रतिशत भी बरसात नहीं हुई, वहीं लगातार चल रही पुरवईया के कारण धान के खेत सूखने लगे हैं, उनमें दरारें पड़ गई हैं। सावन महीने के अंतिम दिन भी जिले में हवाओं संग धूल उड़ती रही। ऐसे में अब धान की फसल के बर्बाद होने का खतरा बढ़ गया है। वहीं किसानों के सामने फसल को सूखने से बचाने व परिवार के जीविकोपार्जन को लेकर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
धान की खेती के लिए मंडल सहित आसपास के जिलों में सर्वोत्तम मानी जाने वाली तराई की धरती सावन मास में भी प्यासी रही। एक तरफ जहां जिले में 20 प्रतिशत से अधिक किसान बरसात न होने के कारण अभी अपने खेतों में धान की रोपाई नहीं कर सके। वहीं जिन किसानों ने किसी प्रकार से धान की रोपाई कर लिया। अब उनके सामने उसे सूखने से बचाने का संकट उत्पन्न हो गया है। सावन में भी इस बार मेघ किसानों को धोखा दे गए।
देखा जाए तो जुलाई माह में औसतन 314.50 मिलीमीटर बरसात होनी चाहिए थी, जिसके सापेक्ष इस बार जिले में मात्र 108.70 मिलीमीटर ही बरसात हुई। जो औसत की 34.56 प्रतिशत है। ऐसे में सुबह से निकलने वाली चिलचिलाती धूप जहां फसलों को झुलसा रही है, वहीं पूर्वा हवाओं के कारण खेतों की नमी भी तेजी से कम हो रही है। सावन में बादलों के धोखा देने से मायूस हुए किसान अब भादौं मास से आस लगा रहे हैं। किसानों का मानना है कि यदि एक सप्ताह बरसात और न हुई तो जिले मेें धान की पैदावार घट कर आधा हो जाएगी।