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ब्राह्मण के कर्तव्यों में यज्ञ, विद्या व दान की प्रधानता

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कटरा (श्रावस्ती)। यज्ञीय धर्म प्रक्रियाओं में भाग लेने से आत्मा पर चढ़े विक्षेप शुद्ध होते हैं। यज्ञ से आत्मा में ब्राह्मण तत्व, ऋषि तत्व की वृद्धि होती है इससे आत्मा को परमात्मा से मिलाने का परम लक्ष्य बहुत सरल हो जाता है। ब्राह्मणत्व यज्ञ के द्वारा ही प्राप्त होता है। इसी लिए ब्राह्मण के कर्तव्यों में यज्ञ, विद्या, दान की प्रधानता है। यज्ञ त्यागमय जीवन के आदर्श का प्रतीक है। यह उद्गार कथावाचक पंडित प्रेम शंकर द्विवेदी ने व्यक्त किए।
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वह गायत्री परिवार की महिला मंडल द्वारा कटरा के बड़की कुटट्ी में आयोजित विराट पंच कुंडीय गायत्री महायज्ञ शिव पुराण संगीत कथा में हिस्सेदारी कर रहे थे। कथावाचक ने यज्ञ का महत्व बताते हुए बताया कि आत्मा और परमात्मा को जोड़ने व बांधने का कार्य यज्ञाग्नि द्वारा ऐसे ही होता है जैसे लोहे के दो टूटे हुए टुकड़ों को वेल्डिंग की अग्नि जोड़ देती है। मनुष्य अपनी योग्यता, शक्ति, विद्या, संपत्ति, प्रतिष्ठा, प्रभाव पद आदि का उपयोग अपने सुख के लिये कम से कम करके समाज को उसका अधिकाधिक लाभ दे।
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