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Shravasti News: इंडो नेपाल बार्डर सड़क को जल्द मिलेगी मंजूरी, सात जिलों को फायदा

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श्रावस्ती। भारत-नेपाल सीमा सड़क घने जंगल और संरक्षित वन क्षेत्र से गुजरेगी। उत्तर प्रदेश के सात जिलों से होकर गुजरने वाली 570 किलोमीटर इस सड़क का 105 किलोमीटर हिस्सा श्रावस्ती में है। इसमें 71 किलोमीटर सड़क संरक्षित वन क्षेत्र से निकलेगी। वन विभाग की अनापत्ति के लिए बजट में दस करोड़ रुपये मिला है।
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भारत नेपाल सीमा को सुरक्षित करने के लिए 2011 में इंडो नेपाल सड़क परियोजना को मंजूरी मिली थी। वैसे तो यह परियोजना नेपाल से सटे सभी प्रदेशों से होकर गुजरेगी। ऐसे में देखा जाए तो यह पूरी परियोजना 1715 किलोमीटर की है। लेकिन 570 किलोमीटर सड़क अकेले उत्तर प्रदेश के साथ सात जिलों में है।
इसमें से श्रावस्ती में 105 किलोमीटर है। इस परियोजना के मैदानी भाग में टू लेन सड़क निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। लेकिन संरक्षित वन क्षेत्र में अनापत्ति न मिलने के कारण परियोजना अधर में लटकी थी। पूरी परियोजना में 55 हजार पेड़ काटे जाने थे।
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इसके साथ पारिस्थितिकी तंत्र में भी छेड़छाड़ की संभावना को देखते हुए वन विभाग ने मंजूरी देने से इंकार कर दिया था। मौजूदा बजट में राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए सड़क को फायर लाइन से सटाकर निकालने की योजना है। इससे अब पेड़ कम काटे जाएंगे। तो जंगली जीवों के घरों में दखल भी कम होगा। राज्य सरकार ने इसके लिए अपने बजट में पैसा दिया है।
भारत की सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) की 154 सीमा चौकियों को जोड़ने के उद्देश्य से 1,715 किलोमीटर लंबी भारत-नेपाल सीमा सड़क का निर्माण होना है। बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और महराजगंज में 574 किलोमीटर सड़क का निर्माण होना है। इसमें 302 किलोमीटर वन भूमि, दो बाघ अभयारण्य (पीलीभीत, दुधवा) और तीन वन्यजीव अभयारण्य (सुहेलवा, कतर्नियाघाट और सोहागी बरवा) पड़ता है। अभी गैर संरक्षित क्षेत्र में 237 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया जा चुका है।
इस परियोजना का विरोध वन विभाग प्रारंभ से ही कर रहा है। इसका कारण है कि इस परियोजना से जंगलों के बीच वन्यजीव निवास स्थान बर्बाद होने की आशंका, ज्यादा पेड़ों की कटाई, बाघ व हाथियों के गलियारों में अशांति की आशंका है। इसके साथ ही तराई क्षेत्र में कुछ विशिष्ट प्रजाति के नम भूमि के सरीसृप व प्रवासी पक्षियों की संरक्षित प्रजातियों के प्रजनन व उनके और घोंसले के नष्ट होने की आशंका है। इस पूरी परियोजना में लगभग सौ किलोमीटर की भूमि वन विभाग तो लगभग 201 किलोमीटर वन्यजीव बोर्ड के दायरे में है।
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