सुन्ना गांव की मासूम गुड़िया की हत्या के बाद व्यवस्था को हिलाकर रख देने वाला तथ्य भी सामने आया है। तीन साल की गुड़िया का स्कूल में दाखिला नहीं हुआ था। उसको पेट भरने के लिए स्कूल में भेजा जाता था। सवाल यह है कि केंद्र और प्रदेश सरकार की तमाम योजनाएं चलने के बावजूद ऐसे परिवार को सहायता क्यों नहीं मिल पाती, जो उन्हें अपने बच्चों को खाने के लिए ही स्कूल भेजना पड़ता है।
कांधला क्षेत्र के गांव सुन्ना निवासी हरेंद्र के पांच बच्चों में गुड़िया सबसे छोटी थी। चार बच्चों का स्कूल में दाखिला है, लेकिन गुड़िया का अभी दाखिला नहीं हुआ था। हरेंद्र मजदूरी करके परिवार को पालता है। मजदूरी भी उतनी नहीं मिल पाती कि ठीक से बच्चों का लालन पालन हो सके। परिवार में कोई बच्चा बीमार पड़ जाए, तो उसकी दवाई के लिए हरेंद्र को पैसा उधार लेना पड़ता था। बृहस्पतिवार को गुड़िया का शव बरामद होने के बाद पुलिस ने हर पहलू पर छानबीन की, तो यह भी पता चला कि गुड़िया को सिर्फ खाने के लिए ही स्कूल जाना पड़ता था। स्कूल में आंगनबाड़ी केंद्र भी है, तो बच्चों के लिए मिड-डे मील भी मिलता है। गुड़िया भी अपने भाई बहन के साथ स्कूल में जाकर खाना खाती थी। उसके घर से स्कूल की दूरी भी ज्यादा नहीं है। सिर्फ पांच मकानों का फासला है। मंगलवार को भी गुड़िया स्कूल में गई थी, लेकिन फिर वह घर नहीं लौटी। बृहस्पतिवार सुबह कृष्णा नदी से उसका शव बरामद हुआ, तो परिवार में कोहराम मच गया।