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Shahjahanpur News: खुटार में होता था स्वांग, जुलूस के साथ नगर में भ्रमण करते थे राजा

Sat, 04 Mar 2023 09:53 AM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
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बड़ागांव में निकाले जाने वाले छोटे लाट साहब के जुलूस का फाइल फोटो। संवाद
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पुवायां। होली पर कई परंपराएं अब समाप्त हो चली हैं तो कई में काफी परिवर्तन आ गया है। खुटार में होली से कई दिन पहले से शुरू होकर और कई दिन बाद तक ढोलक, हरमोनियम, चिमटा, नक्कारा आदि वाद्य यंत्रों पर कलाकारों के माध्यम से होने वाला स्वांग (गंवई भाषा में हास्य व्यंग्य) अब नहीं होता है। धमार भी अब कम निकलती हैं। खुटार में स्वांग देखने उमड़ती थी भीड़
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होली के पर्व से कुछ दिन पहले ही खुटार के मोहल्ला देवस्थान में बल्देव सिंह, जगत उर्फ जगन्ने, माखन, श्याबिहारी, महतिआ आदि की टोली स्वांग के लिए तैयार हो जाती थी। ढोलक, झांझ, हरमोनियम, नक्कारा, चिमटा आदि वाद्य यंत्रों के साथ रात दस बजे सु भार चार बजे तक स्वांग होता था। पुरुषों के साथ ही महिलाओं की भारी भीड़ भी स्वांग देखने आती थी। होली के ईद गिर्द महिलाएं नहीं आती थी। इसका कारण था स्वांग में दिअर्थी संवाद आदि होने लगते थे। होली के दो दिन बाद स्वांग फिर से महिलाओं के देखने लायक हो जाता था। संवाद धमार के बाद शुरू हो जाते हैं शुभ कार्य
जिन घरों में किसी की मृत्यु हो जाती है, वहां होली के बाद शुभ कार्य शुरू करने की परंपरा है। होली पर धमार में शामिल गवैये गमी वाले घरों में आकर ढोलक, चिमटा आदि बजाकर लोकगीत गाते हैं। धमार में शामिल ब्रजभूषण काका बताते हैं कि धमार का जन्म ब्रज भूमि के लोक संगीत में हुआ। इसका प्रचलन ब्रज के क्षेत्र में लोकगीत के रूप में बहुत काल से चला आता है। इन लोकगीतों में राधा कृष्ण के होली खेलने का प्रसंग रहता है। द्रुत गति के दीपचंदी, धुमाली और कभी अद्धा जैसी ताल में युवक युवतियों, प्रौढ़ और वृद्धों, सभी के द्वारा ये लोकगीत गाए जाते हैं और नृत्य भी किया जाता है। अब धमार की परंपरा भी कम हो चली है। कारण है कि युवा इस विधा को ठीक नहीं समझते हैं और दूर होते जा रहे हैं। धमार पार्टी नाम की ही बची है जो परंपरा बचाए हुए हैं।
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खुटार में अब भी राजपरिवार के मुखिया के नेतृत्व में निकलता है जुलूस
रंग खेले जाने के दिन खुटार में पूर्वी गढ़ी के राजघराने से राजपरिवार के मुखिया के नेतृत्व में जुलूस निकलता है। इस दौरान राजा तमाम घरों में भी जाते हैं और लोग उनका तिलक, रंग, गुलाल लगाकर अभिनंदन करते हैं। जुलूस में शामिल होरियारे आज भी स्टील की बड़ी पिचकारियां लेकर चलते हैं। उनकेे साथ कहार मटकों में रंग लेकर चलते हैं। कोरोना काल में जुलूस निकलना बंद हो गया था।
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बड़ागांव में निकलता है छोटे लाट साहब का जुलूस
शाहजहांपुर में होली के दिन लाट साहब का जुलूस निकलता है। इसी तर्ज पर पुवायां के ग्राम बड़ागांव में छोटे लाट साहब का जुलूस निकाला जाता है। बड़ागांव में छोटे लाट साहब का जुलूस भी रंग वाले दिन ही निकाला जाता है। घोड़े पर छोटे लाट साहब के प्रतीक में एक व्यक्ति को बिठाया जाता है और उसकी झाड़ू से खातिरदारी की जाती है।
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