शाहजहांपुर। गन्ना के कैंसर की पहचान रखने वाले लाल सड़न रोग (रेड रॉट) का जनपद में दो वर्ष पहले तेजी से प्रसार होने लगा था। इस रोग के लक्षण पहले रोजा, निगोही और बंडा क्षेत्र के करीब एक दर्जन गांवों में कुछ खेतों तक दिखे, लेकिन बाद में अन्य ब्लॉकों में यह बीमारी तेजी से पैर जमाने लगी। ऐसे में गन्ना शोध परिषद के वैज्ञानिक आगे आए और उन्होंने कोयंबटूर गन्ना अनुसंधान केंद्र के सहयोग से न केवल शीघ्र पकने वाली नई प्रजाति को.शा.-13235 तैयार की, बल्कि गन्ना की कई ऐसी प्रजातियां भी खोजीं हैं जो लाल सड़न रोग प्रतिरोधी हैं।
इस तरह हुई रोग प्रभावित प्रजाति की पहचान
कोयंबटूर अनुसंधान केंद्र ने ही कुछ वर्ष पहले लाल सड़न रोग से प्रभावित प्रजाति को.-0238 खोजी थी। अधिक उत्पादन और ज्यादा चीनी परता देने वाली इस प्रजाति को किसानों ने हाथों-हाथ लिया। ज्यादा चीनी मिलने पर मिल प्रबंधनों ने इसी प्रजाति की बोआई को प्रोत्साहित किया। दो वर्ष पहले तक अधिकांश गन्ना क्षेत्रफल इसी प्रजाति से आच्छादित होता रहा, लेकिन उसमें लाल सड़न का प्रकोप बढ़ा और उस पर कृषि रक्षा रसायन बेअसर होने लगे तो वैज्ञानिकों का माथा ठनका। उन्होंने इस प्रजाति के ऊतकों की प्रयोगशाला में जांच करने पर पाया कि यह फंगस से उपजने वाला बीज जनित रोग है। इसलिए बीज (प्रजाति) को खेतों से विस्थापित करना ही उचित होगा।
ये सभी प्रजातियां लाल सड़न से बेअसर
वैज्ञानिकों ने स्वयं तैयार की गईं ऐसी प्रजातियां भी खोजी हैं, जिनमें लाल सड़न से बचाव को पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता है। परिषद के प्रसार अधिकारी संजीव कुमार पाठक के अनुसार स्थानीय केंद्र से विकसित को.शा.-13235 के बीज का अभी प्रसार हो रहा है। इसलिए परिषद के वैज्ञानिकों ने इस प्रजाति के विकल्प के तौर पर ऐसी प्रजातियां खोजीं जो इस बीमारी से पूरी तरह मुक्त और सुरक्षित हैं। परिषद के सेवरही शोध केंद्र पर वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गईं को.से.-0118 और को.से.-8282 प्रजातियां किसानों के लिए लाभकारी भी साबित हो रही है। परीक्षण में को.लख.-14201 और को.-15023 को भी रेड रॉट प्रतिरोधी पाया गया है।
रोगी प्रजातियों के बीज उत्पादन पर रोक
परिषद ने बीज उत्पादन में रोग ग्रस्त पुरानी प्रजातियों पर रोक लगाने के साथ ऐसी प्रजातियां चुनी हैं जो शीघ्र पकने और पर्याप्त उत्पादन देने में सक्षम हैं। पंजीकृत अभिजनक गन्ना बीज उत्पादक किसानों को भी नई प्रजातियों का बीज तैयार करने के निर्देश दिए हैं। वैैज्ञानिकों का मानना है कि नई प्रजातियों का बीज अधिक तैयार होने पर रोगग्रस्त पुरानी किस्मों के शीघ्र विस्थापन में मदद मिलेगी।
कई वर्ष में तैयार होती है एक प्रजाति
प्रसार अधिकारी के अनुसार गन्ना की एक प्रजाति की प्रजनन प्रक्रिया में कई वर्ष लग जाते हैं। कभी-कभी यह अवधि एक दशक तक हो जाती है। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ कृषि वैज्ञानिकों की पूरी टीम का सहयोग रहता है। बताया कि नई प्रजाति को.शा.-13235 की खोज करने के साथ रोग रोधी प्रजातियों पर शोध करने में प्रजनन अनुभाग के प्रमुख डॉ. विनय श्रीवास्तव व डॉ. अरविंद कुमार, पादप एवं कीट रोग विशेषज्ञ डॉ. सुजीत कुमार, शर्करा वैज्ञानिक डॉ. प्रियंका सिंह आदि का सहयोग रहा।
रेड रॉट से ग्रस्त हुई को.-0238 के बारे में जनपद समेत प्रदेश के किसानों को परिषद के पोर्टल के माध्यम से सचेत कर उसकी बुआई पर रोक लगा दी है। जनपद समेत परिषद से संबद्ध सभी शोध केंद्रों तथा सहकारी चीनी मिल प्रक्षेत्रों पर लगभग 250 हेक्टेयर क्षेत्रफल में अभिजनक गन्ना बीज उत्पादन में रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का चयन किया है। इन प्रजातियों का बीज सभी जनपदों में संबंधित गन्ना विकास परिषदों के माध्यम से किसानों में वितरित किया जा रहा है। -वीके शुक्ला, निदेशक, उप्र गन्ना शोध परिषद