ये किस्में होती हैं तैयार
एक कंपनी एफसी-3, एफसी-5 और एफसी-11 आलू की बोवाई कराती हैं। दूसरी कंपनियां चिप्सोना, एलआर आदि किस्मों की बोवाई कराती हैं। चिप्सोना और एलआर 800 से 900 रुपये प्रति कुंतल बिकता है। पुवायां में रेड रोज (लाल आलू) आलू की खेती भी होती है। इसे न कंपनी पसंद करती हैं और न ही स्थानीय बाजार में कोई खरीदता है।
रेड रोज आलू नेपाल और बिहार के व्यापारी ले जाते हैं। वहां इसकी ज्यादा मांग है। अनुबंधित खेती से जुड़े किसान एक कंपनी की 900 एकड़, दो अन्य कंपनियों का लगभग एक हजार एकड़ आलू तैयार करते हैं। आगरा आदि के कुछ व्यापारी भी अनुबंध पर आलू की खेती कराते हैं।
प्रति एकड़ 80 हजार रुपये लागत
आलू तैयार करने में प्रति एकड़ लगभग 80 हजार रुपये खर्च आता है। इसमें खेती का ठेका शामिल नहीं है। ठेका भी 15 से 20 हजार जोड़ दिया जाए तो लागत एक लाख रुपये तक पहुंच जाएगी। इसमें जुताई के दस हजार रुपये, खाद के 20 हजार, बीज के 30 हजार, स्प्रे के 15 हजार और श्रमिकों पर खर्च पांच हजार रुपये शामिल हैं।
एक एकड़ में 100 से 120 क्विंटल आलू निकले हैं। कंपनियों को बेचने पर आलू 1.25 लाख रुपये तक का निकल आता है। सरकार ने 650 रुपये प्रति कुंतल आलू खरीदने की बात कही है। ऐसे में किसान को आलू बेचने पर लागत तक नहीं निकल सकेगी।
छोटे किसान से नहीं होता अनुबंध
छोटे किसान कंपनियों से अनुबंध पर खेती नहीं कर सकते हैं। इसकी वजह यह है कि कंपनियां बीज आदि का एडवांस रुपये लेती हैं और पांच एकड़ से कम के किसान से अनुबंध नहीं करती है। ऐसे में छोटे किसान चिप्सोना, पुखराज, रेड रोज आदि आलू उगाते हैं और खुले बाजार में बेचते हैं। पुखराज आदि की पैदावार 125 से 150 कुंतल प्रति एकड़ है। बाजार में कम रेट मिलने के कारण छोटे किसानों को ज्यादा लाभ नहीं होता।
लागत ज्यादा, मोल कम
छोटे किसानों की लागत प्रति एकड़ लगभग 60 हजार रुपये आती है। जमीन का ठेका 20 हजार रुपये मान लिया जाए तो लागत 80 हजार रुपये प्रति एकड़ हो जाती है। छोटे किसान पुखराज आदि किस्म के आलू उगाते हैं। अच्छी फसल होने पर प्रति एकड़ लगभग 150 कुंतल आलू निकल आता है। बाजार में इस समय आलू का भाव 400 से 500 रुपये प्रति कुंतल है। इस प्रकार एक एकड़ का आलू 75 हजार रुपये ही निकल रहा है। किसान को प्रति एकड़ पांच हजार रुपये घट रहे हैं और उसकी खुद की मेहनत भी बेकार गई है।
जिले में 14000 हेक्टेयर में बोई गई आलू फसल
दो वर्ष पहले तक जिले में आलू की खेती 10500 हेक्टयर क्षेत्रफल में सीमित थी। कोरोना काल में लॉकडाउन के कारण सब्जियों की आवक थमने से आलू महंगा हुआ तो बीते वर्ष किसानों ने आलू का रकबा बढ़ाकर 11720 हेक्टेयर कर दिया। बीते वर्ष होली से पहले आलू के दाम चढ़े तो किसानों ने इस वर्ष आलू का रकबा बढ़ाकर 14000 हेक्टेयर कर लिया। इस कारण आलू की पैदावार बढ़ गई, लेकिन रेट कम होने से किसान को नुकसान उठाना पड़ गया।
पुवायां के बरौना फार्म के किसान अमनदीप सिंह लवी ने कहा कि अनुबंधित खेती में किसान को पहले से तय रेट मिल जाते हैं। बीज, दवाओं आदि में लागत ज्यादा लगानी पड़ती है। इस बार आलू के रेट बेहद कम रहे हैं। किसान दलजीत सिंह ने कहा कि मैं एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से अनुबंध पर आलू की खेती कर रहा हूं। 15 वर्ष से जुड़ा हूं। कंपनी आलू के ठीक रेट दे देती है। खुले बाजार में तो भारी घाटा हो जाता है।
रामपुर कलां के किसान विजय वर्मा ने कहा कि गत वर्ष बारिश में आलू की फसल से नुकसान हुआ था। इस बार आलू के रेट कम होने से जमीन में प्रति एकड़ 20 हजार और ठेके की जमीन से 40 हजार रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। किसान पुत्तूलाल ने कहा कि इस बार बहुत नुकसान हुआ है। 250 से 300 रुपये प्रति क्विंटल तक आलू की बिक्री हुई है। प्रति एकड़ 40 हजार का नुकसान हुआ है। सरकार को आलू किसानों को राहत देनी चाहिए।