पुवायां (शाहजहांपुर)। तहसील क्षेत्र में तैयार की जा रही खरबूज की मुस्कान और गुल्ला किस्म की मिठास ने उत्तराखंड के लोगों को कई साल से अपना मुरीद बना रखा है। वर्तमान में कई व्यापारी सुबह से यहां डेरा डाल लेते हैं। वाहनों से इन दोनों किस्मों के खरबूज की आपूर्ति वहां के विभिन्न शहरों में की जा रही है।
गुटैया क्षेत्र खेती में नए प्रयोग और नकदी वाली फसलों के लिए मशहूर हो रहा है। कभी गन्ना उत्पादन में अग्रणी रहने वाले इस क्षेत्र में अब गन्ने का रकबा नाममात्र का ही बचा है। साठा धान पर प्रतिबंध लगने के बाद किसानों ने मक्का आदि की खेती शुरू कर दी है। अब अगर किसी फसल का रकबा लगातार बढ़ रहा है तो वह है खरबूज।
गुटैया क्षेत्र के अलावा रामपुर कलां, मीरपुर, गंगाई, पकड़िया हकीम, बहादुरपुर आदि में खरबूज की लगभग एक हजार एकड़ में खेती की गई है। खास बात यह है कि कोई भी किसान खरबूज की खेती खुद न करके लोगों को अपना खेत तीन महीने के लिए 25 से 30 हजार रुपये एकड़ में ठेके पर दे देते हैं। ठेके पर खेत लेने वाले इसके विशेषज्ञ होते हैं। वह भी 90 दिन में जमकर मुनाफा कमा लेते हैं। संवाद
देर से तैयार होते हैं इन दोनों किस्मों के फल
कई किस्म का खरबूज पुवायां तहसील क्षेत्र में बोया जाता है। इसमें गुल्ला सबसे ज्यादा मीठा होता है। इस कारण गुल्ला का दाम भी अधिक है। इसके बाद खरबूज की मुस्कान किस्म की ज्यादा मांग है। यह भी काफी मीठा है। सामान्य खरबूज में गंगा सतलुज, सोनपरी, कुमुद सहित कई किस्म बोई जाती हैं। सामान्य किस्मों में खरबूजा जल्दी लगने लगता है। गुल्ला और मुस्कान थोड़ी देर से तैयार होता है।
सरकार प्रयास करे तो बढ़ सकती है खेती
किसान राममिलन, विमलेश कुमार, रामसुमिरन, आशीष, रामचंद्र आदि ने बताया कि खीरा, तरबूज, खरबूज, तोरई आदि की खेती का काम बेहद कच्चा है। जरा-सी बारिश भारी नुकसान पहुंचा देती है। इसके अलावा झुलसा, मकड़ी सहित तमाम रोग भी फसल को हानि पहुंचाते हैं। इससे बचने के लिए फसल में लगातार कीटनाशक दवाओं को स्प्रे करना पड़ता है। तीन महीने में लगभग 90 बार स्प्रे हो जाता है। स्प्रे करने वाली दवाएं काफी महंगी होने से इस पर भारी खर्च आता है। दवाओं को अनुदान पर दिए जाने से किसानों को काफी राहत मिल सकती है। खीरा और खरबूज की खेती को बढ़ावा मिल सकता है।
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मक्का भी बढ़ा रहा किसानों की कमाई
साठा का विकल्प मक्का पहले रेतीले क्षेत्रों में पैदा होता था। पुवायां में इसकी खेती न के बराबर थी। अब आलू की खुदाई के बाद तमाम खेतों में मक्का लहलहा रहा है। कुछ किसानों ने गेहूं काटकर मक्का बो दिया। मक्का कटने के बाद धान की मुख्य फसल की जाएगी। किसान तारा सिंह बताते हैं कि मक्का में दानवीर, पायनियर और त्रिकाल किस्म की फसल तैयार की जाती है। दानवीर 95 से सौ दिन में, पायनियर और त्रिकाल सौ से 110 दिन में तैयार होता है। प्रति एकड़ लगभग 30 हजार रुपये लागत आती है। एक एकड़ में लगभग 60 क्विंटल मक्का निकलता है। पिछले वर्ष 11 से 12 सौ रुपये प्रति क्विंटल मक्का बिका था। इस प्रकार एक एकड़ में किसान को लगभग 40 से 42 हजार रुपये की आय हो जाती है।