रामगंगा और बहगुल नदी के बीच बसे करीब डेढ़ दर्जन गांवों के हजारों लोग एक बार फिर भारी परेशानी में घिर गए हैं। बरसाती मौसम आते ही बहगुल नदी पर बना अस्थाई पुल टूट चुका है और इन ग्रामीणों के लिए आवागमन का सहारा एक टूटी नाव है। सबसे ज्यादा परेशानी उन स्कूली बच्चों को हो रही है, जो पढ़ने के लिए कस्बे में जाते हैं। जनता को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने के सरकारी दावों की असलियत देखनी है तो कस्बे से करीब 10 किलोमीटर दूर बहगुल और रामगंगा नदी के बीच बसे उन गांवों को जाना होगा, जहां अब भी लोग नरकीय जीवन जीने को विवश हैं। इनमें संगहा, रामपुर ढका डांडी, मिल्किया खुर्द, अतरी, गोरा, कुंडरा पहाड़पुर, कील्हापुर खुर्द, थाथरमई उइला, हवा मड़ैया समेत 15 गांव शामिल हैं। खास बात यह है कि इन गांव में से संगहा वर्ष 2013-2014 तथा रामपुर ढाक डांडी इस साल समग्र गांव में शामिल हुआ है। मगर इन गांवों तक जाने को पक्के रास्ते की बात छोड़िए कच्चा रास्ता तक मुहैया नहीं है। यही नहीं इन गांवों का थाना तथा ब्लाक मिर्जापुर है जबकि इन सभी गांवों का सीधा जुड़ाव जलालाबाद से है। गांव के दक्षिण रामगंगा और उत्तर में बहगुल है, लेकिन किसी भी ओर पक्का पुल नहीं है। हालांकि बहगुल नदीं पर पीडब्लूडी की ओर से अस्थाई पुल बना दिया जाता है, लेकिन बरसात के शुरू होते ही इसे तोड़ भी दिया जाता है। करीब दस दिन पहले उक्त पुल को तोड़ दिया गया, लेकिन लोगों के आने जाने को कोई सरकारी नाव तक मुहैया नहीं कराई गई। नदी पर पड़ी एक प्राइवेट नाव ही अब लोगों के आने जाने का एक मात्र सहारा है। ग्रामीणों के अनुसार यह नाव भी काफी जीर्ण शीर्ण हालत में होने से कभी भी हादसे का कारण बन सकती है। उधर, रामगंगा और बहगुल नदियां उफान पर आ जाने के कारण स्थिति और भी गंभीर हो गई है।