खुटार और अल्हागंज में सालों से चोरी, छिनताई और गुंडई का पर्याय बने दो हिस्ट्रीशीटर अब गत पांच माह से रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में यात्रियों को लूटने और चोरी के वारदातों में लिप्त हो गए थे। जिला पुलिस को भी इनकी सरगर्मी से तलाश थी। शनिवार तड़के करीब साढ़े तीन बजे शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन के सटे मालगोदाम के पास जीआरपी की रूटीन चेकिंग के दौरान ये लोग पकड़े गए और जेल भेज दिए गए। दोनों ने गत पांच माह में बरेली से हरदोई स्टेशनों के बीच 50 से अधिक चोरियां कबूली हैं। रेल पुलिस को दोनों ने बताया कि हर रात जब तक कोई वारदात न कर लें, हमें चैन नहीं आता, क्योंकि नशे और जुए की लत की जरूरत के लिए रुपये चोरी का सामान बेचकर ही जुटाते थे।
शनिवार तड़के शाहजहांपुर जीआरपी थाना प्रभारी जयशंकर सिंह दो कांस्टेबल विजय और अरविंद के साथ रूटीन चेकिंग के दौरान सुनसान पड़े रहने वाले मालगोदाम के पास से गुजरे। वहां अंधेरे में बातचीत होने की आवाज आने पर टीम ने आवाज वाली दिशा में रुख किया तो दो लोग भागते दिखे। दोनों की उम्र 40 से अधिक थी और वह ज्यादा दूर भी भाग नहीं पाए। पुलिस ने दोनों को दबोच लिया और जीआरपी थाने लाकर पूछताछ की तो खुलासा हुआ कि दोनों ही पुराने शातिर और अपने-अपने इलाके के हिस्ट्रीशीटर हैं। इनमें से एक विनोद कुमार गुप्ता उर्फ टुइयां खुटार के नारायणपुर का रहने वाला है। उसके खिलाफ खुटार थाने में गैंगेस्टर, गुंड़ा एक्ट, चोरी, आबकारी और एनडीपीएस एक्ट के कुल 19 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। दूसरा सुनील कुमार उर्फ सकैटिया अल्हागंज थाना क्षेत्र के हारू मुड़िया खुर्द का निवासी है। उसके खिलाफ अभी पुलिस रिकार्ड में आठ केस ही दर्ज मिले हैं, जबकि उसने पूछताछ में अनगिनत अपराध कबूले हैं। करीब आठ साल पहले वह अल्हागंज में रामप्रकाश की बंदूक चोरी और वीरेंद्र दूबे के यहां आधा दर्जन लुटेरों के साथ डाका डालने के मामले में जेल भी जा चुका है।
जीआरपी एसओ जयशंकर सिंह ने बताया कि दोनों ने पूछताछ में खुलासा किया कि जिला पुलिस ने जब नकेल कसी तो इन दोनों ने अपने-अपने आपराधिक इलाके बदल दिए एवं रेलवे का रूट इन्हें सबसे आसान लगा। स्टेशन पर या ट्रेन में सो रहे यात्रियों की अटैची और बैग काटने के लिए ये अत्याधुनिक छोटी कैंची वाले आकार का कटर, प्लास और अन्य धारदार औजार साथ रखते थे। उन्होंने हरदोई, आंझी शाहाबाद और बरेली स्टेशनों पर सर्वाधिक वारदातें करने की बात कबूली है। इनका कहना है कि ट्रेन यात्रियों का लगेज काटने में इन्हें यह सहूलियत रहती थी कि अधिकांश मामलों में पुलिस के पास शिकायत ही दर्ज नहीं हुई और वह अभी तक रेल पुलिस की नजर में नहीं आए थे।