परिवारिक कलह से तंग आकर बल्लिया गांव में एक विधवा ने अपने आपको जिंदा जला लिया, उन्हें गंभीर हालत में जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां दौरान इलाज उसकी मौत हो गई।
थाना क्षेत्र के बल्लिया गांव निवासी 50 वर्षीय रईसाबानो के पति शाकिर की मौत 10 साल पहले हो चुकी है। रईसाबानो मेहनत मजदूरी कर अपने पांच बच्चों का भरण पोषण कर रही थीं। रईसा का एक बेटा गुलफाम मानसिक रूप से विकलांग है।
प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि सोमवार की सुबह रईसाबानो अपने घर में थी। करीब आठ बजे उसके घर से आग की लपटे उठने लगीं। रईसा की 11 साल की बेटी गजाला ने जब अपनी मां को आग की लपटों में घिरा देखा तो वह चीख चीख कर रोने लगी।
ग्रामीणों ने मौके पर पहुंच कर किसी तरह से आग को बुझाया, लेकिन तब तक वह 90 प्रतिशत जल चुकी थीं। आननफानन में रईसा का बड़ा बेटा वसीम अपनी मां को जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां दोपहर बाद उसकी मौत हो गई।
रईसा के आग लगाने के मूल में चर्चा है कि उनका मकान 40 मीटर की जमीन में बना है, जिसमें एक कमरा है। आगे छप्परनुमा काली पन्नी का तिरपाल तना है। शनिवार के दिन बरसात होने के कारण रईसा ने अपनी पुत्रवधू से कहा कि विकलांग गुलफाम और गलाजा बेटी को कमरे में लेट जाने दो।
इसी बात को लेकर उसकी पुत्रवधू से कहासुनी हो गई थी। शनिवार की सुबह रईसा का बेटा और उसका भाई उसके साथ मारपीट पर उतारू हो गए थे। इससे रईसा काफी आहत थी। सोमवार की सुबह आठ बजे रईसाबानो ने पहले दुपट्टे से अपना गला कसा और फिर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा ली। उस समय उसके बच्चे घर के बाहर थे और पुत्र काम पर गये थे।
घायल रईसाबानो ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि खाना बनाते समय उसके कपड़ों में आग लग गई गई। इससे वह गंभीर रूप से जली हैं। बयान की वीडियोग्राफी भी की गई है। पोस्टमार्टम के लिए पंचनामा भरा जा रहा है। गला कसने की बात पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ही उजागर होगी। रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
- आरएन चौधरी, प्रभारी निरीक्षक, रोजा
हादसे के समय हम काम की तलाश में निकले थे। सूचना मिलने पर घर पहुंचा तो बाहर लोग मेरी मां को अस्पताल ले जाने की तैयारी कर रहे थे। मेरी मां ने आग लगाई या आग लगी हम नहीं बता सकते।
- वसीम खां, मृतका का पुत्र
कैसे कटेगा का गुलफाम और गलाजा का जीवन
रोजा। दस साल से अपनी औलादों को पालने के लिए गरीबी और बेबसी से लड़ रही रईसाबानो अपनों से ही जंग हार गई और मौत को गले लगा लिया।
अब मां के बिना विकलांग बेटे गुलफाम और अवयस्क बेटी गजाला का पालनहार कौन होगा? यही सोचकर ग्रामीणों की आंखें नम हैं। ग्रामीणों ने बताया कि रईसाबानो जीवट महिला थी, जिसने पति शाकिर की मौत के बाद कभी हार मानना नहीं सीखा।
उसके पास गरीबी का राशन कार्ड नहीं था। उसको विधवा पेंशन भी नहीं मिल रही थी। आय का कोई साधन न होते हुए भी उसने अपने पांच बच्चों को पालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उसके द्वारा आत्महत्या करने की बात लोगों के गले नहीं उतर रही।
रईसाबानो से जरूर कोई बात हुई होगी तभी उसने पहले गले को कसा फिर आग लगाई ताकि उसकी चीख बाहर न निकल सके। रईसबानो ने शायद अपनों से जंग लड़ना नहीं सीखा था, इसलिये मौत को गले लगा लिया।