फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दीमक को ही चाट जाता है फफूंद

Sat, 01 Aug 2015 08:27 PM IST
जनार्दन सिंह/शाहजहांपुर।
विज्ञापन
विज्ञापन
गन्ने की फसल को भीतर ही भीतर चाट जाने वाले दीमक और सफेद गीडार नामक कीट को ही चट करने में एक खास फफूंद को महारथ हासिल है। यह मिट्टी के नीचे दीमक की कॉलोनी में महामारी बनकर कहर ढाता है। महंगे रासायनिक कीटनाशक दवाओं की तुलना में यह काफी किफायती भी है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद द्वारा परीक्षण शुरू होने के चौथे वर्ष ही यह किसानों का खासा चहेता बन चला है।
विज्ञापन

गन्ने की फसल को उक्त दोनों कीटों से निजात दिलाने को परिषद बीते काफी समय से चिंतित था। वर्ष 2012 में बंगलुरूस्थित सेंटर फार इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट ने दीमक के खात्मे के लिए मेटाराइजियम एनआईसोबिली नामक फफूंद और सफेद गीडार के नाश के लिए बिवेरिया बैसियाना फफूंद को आजमाने का सुझाव दिया। ये दोनों ही बासी रोटी पर नीले या हल्के रंग में आसानी से उपलब्ध होते हैं और वही समयकाल इनके जीवन चक्र के शुरुआत का होता है। शोध परिषद के विज्ञानियों ने लैब में रोटी पर पहले इन्हें उगाया और इसकी परत को खुरचा। सुई की नोंक बराबर मेटाराइजियम फफूंद को लेकर एक एमएल आलू और चीनी के तरल घोल (वैज्ञानिक भाषा में पोटैटो डेक्सटोज) में डाला तो उसका जीवन चक्र पूरे रौ में पनपा। फिर इसे एक किलोग्राम टेलीकाम पाउडर में मिलाकर पैक कर दिया और दो किलो प्रति क्विंटल के हिसाब से गोबर की खाद में मिलाया। मिश्रण को करीब 20 फीसदी नम कर दिया एवं छह दिन तक छांव में रखा। फिर खेत में डाला तो संपर्क में आया हर दीमक अधिकतम पांच दिन में और पूरे खेत में 20 से 30 दिन में मरा हुआ मिला और पौधे तक नहीं पहुंच पाया। इसी विधि से तैयार और इस्तेमाल किए जाने पर बिवेरिया ने भी सफेद गीडार को चट करने में वही रिजल्ट दिया।
यह परीक्षण करने वाले शोध परिषद के वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. केपी पांडेय, डॉ. अरुण कुमार सिंह, डॉ. अजय सिंह आदि बताते हैं कि शुरुआत में चार किसानों ने काफी छोटे स्तर पर आजमाया, लेकिन नतीजा हैरतअंगेज मिला तो अब शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, सीतापुर और हरदोई के 118 किसानों के यहां करीब 25 हेक्टेयर में इसे अपना लिया है। परिषद की ओर से किसानों को 150 रुपये प्रति किलो की दर पर मुहैया कराया गया है। एक एकड़ गन्ने की फसल की बुआई के दौरान दो किलो फफूंद का इस्तेमाल काफी असरकारी रहता है।
विज्ञापन


दीमक की कॉलोनी में होती है 10 हजार की आबादी
शाहजहांपुर। उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद में मृदा विज्ञान विभाग में गन्ने को चट करने वाले माटी में नीचे रहने वाले दीमक नामक कीट का रोचक ब्योरा है। बलुअट दोमट मिट्टी में सतह से दो से ढाई मीटर नीचे इनकी अपनी कॉलोनी होती है। उसमें अमूमन करीब 10 हजार की आबादी होती है। चार स्तरीय राजकाज व्यवस्था रहती है। एक वर्ग राजा और दूसरा वर्ग रानी होती है। ये दोनों वंश बढ़ाने की मुख्य भूमिका में मशगूल रहते हैं। तीसरा वर्ग सैनिकों का होता है, जो कालोनी और आबादी की सुरक्षा निगरानी की जिम्मेदारी संभालता है। चौथा वर्ग श्रमिकों का होता है जो भोजन की तलाश करते हैं, भोजन करते हैं और राजा-रानी के लिए भी भोजन जुटाकर देते हैं। मृदा विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. रामेश्वर दयाल तिवारी के अनुसार, मेटाराइजियम एनआइसोबिली फफूंद से यह आबादी बुरी तरह घबराती है, कारण फफूंद इनके शरीर पर संक्रमण कर इन्हें बीमार कर देता है। फिर बीमारी एक-एक करके सारी आबादी को ग्रसित करती है एवं बीमारी के चपेट में आने वाला हर सदस्य चार से पांच दिन में ही नष्ट हो जाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें