जलालाबाद के बड़े हरेवा गांव में निर्लज्जतापूर्वक निर्वस्त्र करके गांव में घुमाई गईं दलित महिलाएं शासन से मिली आर्थिक सहायता से और ज्यादा आहत दिखीं। सवाल उठाया-पूरे गांव के सामने तार-तार हुई उनकी इज्जत क्या सरकार के दिए रुपयों से वापस सकती है। हम तो मेहनत-मजदूरी करके दो वक्त की रोटी में खुश थे। जालिमों ने दामन पर हमेशा के लिए ऐसा दगा लगा दिया जो किसी भी सूरत में धुल नहीं सकता।
पांचों दलित महिलाओं को सरकार की तरफ से मिलने वाली सहायत राशि भी उनके जख्मों पर महरम नहीं लगा पा रही है। उन्हें मलाल है कि उनकी खोई इज्जत यह रुपये वापस नहीं कर सकते हैं। वह तो अपने परिवार के साथ मेहनत-मजदूरी करके इज्जत से दो जून की रोटी में ही खुश थीं। समाज में उनकी इज्जत खोने के बाद उनके लिए रुपये का कोई महत्व नहीं रह गया हैं। हम तो गरीबी में ही खुश थे। मेहनत-मजदूरी करके जो हासिल होता था वही सुकून देता था। समाज के सामने सिर उठाकर तो चल पाती थीं। इस घटना ने उन्हें तोड़ कर रख दिया है। अब चाहे जो हो जाए किसी से आंख मिलाकर बात करने लायक भी नहीं रह गई हैं।
लड़के की मां का कहा कि जिन जालिमों ने उन्हें बेज्जत किया है, अगर वे उनकी इज्जत बख्शने के बदले रुपये मांगते तो वे कहीं से भी उधार लेकर या घर-वार बेचकर उन्हें दे देतीं। रुपये से अगर इज्जत वापस आ सकती है तो उन जालिमों को दे दो, जिन्होंने समाज में हमें बदनाम किया। वह रुपये से उनकी इज्जत वापस करके दिखाएं तो वे जानें। लड़के की ताई ने कहा कि वह गरीब जरूर हैं, लेकिन उन्हें अपनी और अपने परिवार की इज्जत प्यारी थी। उन्हें बदनाम करके दरिंदों को क्या मिल गया। पीड़िता चाची ने कहा कि रुपये से किसी की इज्जत नहीं खरीदी जा सकती है। बदला लेने के लिए आरोपियों ने उनकी इज्जत को सरेआम नीलाम कर दिया। दूसरी चाची ने कहा कि रुपया सब कुछ दे सकता है, लेकिन रुपये में इतनी दम नहीं है कि वह उनकी खोई इज्जत वापस कर दे। तीसरी चाची ने कहा कि माना कि आज के समय में रुपया बहुत बड़ी चीज है, लेकिन इतनी बड़ी भी नहीं कि उससे खोई इज्जत पाई जा सके।