सदर बाजार थाना क्षेत्र में तीन साल पहले घरेलू नौकर की हुई मौत के बहुचर्चित मामले में कुर्की का आदेश जारी होने पर मुख्य आरोपी सहेलियां 35 वर्षीय शालिनी सहगल और 31 वर्षीय एकता मैसी अपर सत्र न्यायाधीश अष्टम गोपाल उपाध्याय के कोर्ट में अलग - अलग सरेंडर हुई। दोनों ने अपनी जमानत याचिका लगाई थी और एडीजीसी सुनील कुमार सिंह के तर्कपूर्ण विरोध एवं पुलिस द्वारा इस प्रकरण में प्रस्तुत तथ्यों का अवलोकन करते हुए कोर्ट ने दोनों की याचिका निरस्त कर दी। दोनों को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। इस मामले में इन सहेलियों के साथ सह आरोपी गोलू पहले से ही जेल में हैं और उसकी जमानत याचिका इसी मामले सत्र न्यायालय और हाईकोर्ट से निरस्त हो चुकी है। इस संबंध में मृतक के भाई चंद्र बहादुर की तहरीर पर सदर बाजार थाना में पहली जनवरी 2013 को आईपीसी की धारा 344, 308, 504 और 506 में एफआईआर दर्ज हुई थी। दोनों मुख्य आरोपी में से एकता मैसी बरेली के इज्जतनगर थाना क्षेत्र के गायत्री नगर मोहल्ला की निवासी है जबकि शालिनी सहगल शाहजहांपुर के सदर बाजार थाना क्षेत्र के आवास विकास परिषद के मकान नंबर 43 की निवासी है। कोर्ट में दाखिल पुलिस के चार्जशीट और एफआईआर के अनुसार, पहली जनवरी 2013 से आठ माह पहले बरेली में रहने वाले वादी के भाई मन बहादुर को उसके परिचित गोलू ने शाहजहांपुर के सदर बाजार स्थित सहगल कोठी में नौकरी के बहाने ले गया था। गोलू खुद तो कुछ समय बाद बरेली वापस पहुंच गया लेकिन मन बहादुर को यहीं छोड़ गया। वहां वादी ने उससे कई बार अपने भाई के बारे में जानकारी की तो हर बार एक ही जवाब मिला कि वह ठीक है और नौकरी कर रहा है। एक बार वादी ने गोलू से उसका संपर्क नंबर लिया तो डायल किया तो दूसरी ओर से कॉल रिसीव करने वाली महिला ने काफी गाली गलौज करते हुए वादी को जान से मारने की धमकी दी। फिर 31 दिसंबर 2012 की रात गोलू अपने एक साथी के साथ मन बहादुर को बेहोशी की हालत में लेकर चंद्र बहादुर के पास बरेली पहुंचे। मन के शरीर पर गंभीर चोटें थीं और देखकर लग रहा था कि उसे बुरी तरह डंडों और धारदार हथियार से मारा गया है। होश आने पर उसने भाई से कहा कि सहगल कोठी में उसे रोज मारा जाता था, खाना नहीं दिया जाता था, बिना वेतन के दिन - रात काम कराया जाता था और घर जाने की बात करने पर कमरे में बंद कर दिया जाता था। केस दर्ज होने के बाद मन बहादुर की मौत हो गई और उसका पोस्टमार्टम कराया गया। पीएम रिपोर्ट में 11 चोट का उल्लेख किया गया और मृतक के नाखून तक निकाल लिए गए थे। चोट इतने गंभीर थे कि 16 दिन के उपचार के बाद भी वह चल बसा। सरकारी वकील सुनील कुमार सिंह ने अपनी बहस में कहा कि दोनों मुख्य आरोपी और सह आरोपी ने मन बहादुर को गंभीर यातनाएं दीं और कोर्ट द्वारा आईपीसी की धारा 319 के तहत तलब किए जाने पर लगातार उसका विरोध किया एवं कुर्की का आदेश जारी होने पर कोर्ट में दोनों आरोपी युवतियां सरेंडर हुई हैं, ऐसे में जमानत दिए जाने का कोई आधार नहीं है।