जर्जर गांधी भवन प्रेक्षागृह में कार्यक्रम करना कोई आसान काम नहीं है। रविवार को हुए नाटक दाराशिकोह की तैयारियों के दौरान शनिवार की रात जो सीलिंग टूट कर गिरी थी, प्रशासन उसकी मरम्मत कराना तो दूर भारी-भरकम प्लाई को हटवा तक नहीं सका। कलाकार उसी मलबे के ऊपर से निकलते हुए नाटक का मंचन करते रहे, वहीं दर्शक और कलाकार जान जोखिम में डाले नाटक का मंचन करते और देखते रहे।
इसे प्रशासन की संवेदनहीनता कहें या फिर निष्क्रियता अथवा सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रति उनका हठी रवैया, कि वर्षों से जीर्णशीर्ण हो चुकी गांधी भवन की सीलिंग की मरम्मत नहीं कराई गई। जबकि यहां आए दिन सरकारी कार्यक्रम होते ही रहते हैं। बिना मरम्मत के जगह-जगह लटकते प्लाई के तख्ते के नीचे कार्यक्रम कराना सीधे तौर पर बड़ी दुर्घटना को दावत देने जैसा है। प्रशासन को शायद इस बात का इंतजार भी है कि यहां कोई बड़ी घटना हो। तभी तो उसने अभी तक इस ओर ध्यान नहीं दिया, जबकि सरकारी कार्यक्रमों में डीएम समेत लगभग सभी अधिकारी शिरकत करते ही रहते हैं।
प्रशासन गांधी भवन की हालत पर तरस खाने के बजाय उससे किराया वसूलने में अधिक रुचि दिखाता रहा है। तभी तो सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए सुविधाएं जुटाने के बजाय जादू जैसे व्यवसायिक शो के लिए महीनों तक की बुकिंग कर लाखों रुपये किराया वसूल कराता रहता है। कलाकारों का कहना है कि प्रशासन इस आमदनी से ही प्रेक्षागृह की मरम्मत, परदे को चलाने वाली मशीन, कुछ लाइटें और साउंड सिस्टम ठीक करा सकता है, लेकिन प्रशासन को किसी दुर्घटना का शायद इंतजार है। आला अधिकारी अपने उत्तरदायित्व से बचते हुए सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए बनी एक मात्र धरोहर को ही नष्ट करने में जुटे हैं। इससे कलाकारों में रोष पनप रहा है। जिला प्रशासन के खिलाफ उनका गुस्सा किसी भी दिन फूट सकता है।