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Chaitra Navratri 2023: आल्हा-ऊदल से जुड़ा है जालपा देवी मंदिर का इतिहास, पूरी होती हैं भक्तों की मनोकामना

Wed, 22 Mar 2023 04:00 AM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहांपुर

सार

किवदंती है कि जालपा देवी महोबा के वीर योद्धा और परमार सामंत आल्हा व उनके छोटे भाई ऊदल की ईष्ट देवी थीं। यह भी कहा जाता है कि यह मंदिर पहले नाहिल में था।
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प्राचीन जालपा देवी मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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शाहजहांपुर के सेहरामऊ दक्षिणी में जालपा देवी का प्राचीन मंदिर है। मंदिर से कई परंपराएं जुड़ी हैं। किवदंती है कि जालपा देवी महोबा के वीर योद्धा और परमार सामंत आल्हा व उनके छोटे भाई ऊदल की ईष्ट देवी थीं। यह भी कहा जाता है कि यह मंदिर पहले नाहिल में था। इसका निर्माण राव हरि सिंह ने कराया था। मुगलों ने मंदिर को नुकसान पहुंचाया तो देवी को सेहरामऊ दक्षिणी में स्थापित किया गया। नवरात्रि पर जालपा देवी मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। 

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इतिहासकार डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा की पुस्तक ‘शाहजहांपुर : ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर’ में भी इस मंदिर का जिक्र है। डॉ. मेहरोत्रा के मुताबिक, सेहरामऊ दक्षिणी में स्थित कालिका माई (जालपा देवी) का मंदिर प्राचीन परंपराओं से बंधा है। 12वीं शताब्दी में महोबा के वीर राजपूत आल्हा और ऊदल की यह ईष्ट देवी थीं। कवि जागनिक ने आल्हा खंड में इन राजपूत युवकों के अदम्य साहस का वर्णन किया है।

पहले नाहिल में था यह मंदिर  

कहा जाता है कि प्रारंभ में यह मंदिर नाहिल में था। नाहिल राजपूतों का प्रमुख केंद्र रहा है। नाहिल के शासक राव हरि सिंह ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। मुगल शासकों और नाहिल के राजपूतों के बीच संघर्ष में मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया था। अब यह मंदिर सेहरामऊ में है। मंदिर में देवी की मूर्ति के अतिरिक्त उस काल की टूटी मूर्तियां भी हैं। ठाकुर शिवराज सिंह के अनुरोध पर शिवप्रसाद सेठ ने इस मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए 35 हजार रुपये दान दिए थे। पूर्व में लाला कालीचरन सेठ ने धर्मशाला व कुआं बनवाया जो अब नष्ट हो चुके हैं।

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पहले लगता था यहां मेला 

डॉ. मेहरोत्रा बताते हैं कि 1910 में प्रकाशित शाहजहांपुर गजेटियर में भी यहां लगने वाले मेले की चर्चा है। पुजारी सियाराम माली बताते हैं कि आल्हा-ऊदल ने आषाढ़ माह की अमावस्या के बाद पड़ने वाले सोमवार को मंदिर परिसर में जात का मेला भी लगता आ रहा है। जहां दूरदराज के क्षेत्रों से लोग माता के दर्शन करने और मेला देखने आते हैं। नवविवाहित जोड़े भी मंदिर पर आकर माता की पूजा अर्चना कर आशीर्वाद लेते हैं।

मेले में लगती हैं फर्नीचर की दुकानें

जात के मेले में दूरदराज के दुकानदार अपनी दुकानें लगाने आते हैं। लकड़ी से बने फर्नीचर की दुकानें बहुतायत लगती हैं। इसके साथ ही महिलाओं के लिए शृंगार का सामान, बच्चों के लिए खिलौने आदि की दुकानें भी लगती हैं। इसके साथ ही मनोरंजन के लिए सर्कस, झूले, डांस पार्टी भी लगती हैं।
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बाबा भैरवनाथ का भी मंदिर

जालिपा माता मंदिर में बाबा भैरवनाथ का मंदिर भी स्थित है। मान्यता है कि माता के दर्शन के बाद भैरवनाथ के दर्शन जरूर करने चाहिए। इससे मनोकामना जल्द पूरी होती है। बाबा भैरवनाथ मंदिर के पुजारी मुनेश्वर दयाल मिश्रा बताते हैं कि मां जालपा का मंदिर बहुत ही प्राचीन है और सच्चा दरबार स्थित है। बाबा भैरवनाथ भी माता के मंदिर परिसर में मौजूद हैं। श्रद्धालु उनका भी आशीर्वाद लेते हैं।
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