पहले लगता था यहां मेला
डॉ. मेहरोत्रा बताते हैं कि 1910 में प्रकाशित शाहजहांपुर गजेटियर में भी यहां लगने वाले मेले की चर्चा है। पुजारी सियाराम माली बताते हैं कि आल्हा-ऊदल ने आषाढ़ माह की अमावस्या के बाद पड़ने वाले सोमवार को मंदिर परिसर में जात का मेला भी लगता आ रहा है। जहां दूरदराज के क्षेत्रों से लोग माता के दर्शन करने और मेला देखने आते हैं। नवविवाहित जोड़े भी मंदिर पर आकर माता की पूजा अर्चना कर आशीर्वाद लेते हैं।