मेंहदावल। कबीर की धरती पर बात स्वतंत्रता आंदोलन की हो तो मिश्र बंधुओं का नाम सबसे पहले आता है। आजादी के आंदोलन में यह परिवार देश के लिए जान लुटाने के लिए तैयार था। जनपद के रक्शा गांव निवासी मिश्र बंधुओं ने तत्कालीन बस्ती जनपद में स्वतंत्रता आंदोलन की कमान संभाली थी। अंग्रेजी शासन के मुख्य स्तंभ रहे राजा चंगेरा के खिलाफ वर्ष 1930 में मेंहदावल क्षेत्र के रक्शा गांव निवासी पंडित लालसा प्रसाद मिश्र, श्यामलाल मिश्र, बंशराज और द्विजेंद्र ने विद्रोह का बिगुल फूंका था। वर्ष 1941 में गोरखपुर जिले के डोहरिया में ट्रेन लूटने की घटना का नेतृत्व करने के कारण अंग्रेजों ने उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने का फरमान जारी किया था। आजादी के बाद पंडित लालसा प्रसाद मिश्र विकास खंड मेंहदावल के ब्लॉक प्रमुख निर्वाचित हुए और आगे चलकर मेंहदावल विधानसभा का नेतृत्व भी उन्होंने किया और कांग्रेस पार्टी से विधायक चुने गए।
बांसी स्थित उनके महल के सामने विद्रोह को लेकर सभी को कठोर यातनाएं झेलनी पड़ी थी। पंडित लालसा प्रसाद मिश्र के बुलावे पर राजा चंगेरा को ठिकाने लगाने के लिए चंद्रशेखर आजाद भी बांसी आए थे। यह सूचना राजा चंगेरा तक पहुंच जाने के कारण वह वापस लौट गए। अंग्रेजी शासन के आंखों की किरकिरी बन जाने से सबसे बड़े भाई लालसा प्रसाद मिश्र को नैनी सेंट्रल जेल भेज दिया गया था। जेल में बंद के दौरान उनके इकलौते पुत्र की मृत्यु हो गई थी, लेकिन अंग्रेज सरकार ने इन्हें पैरोल तक नहीं दिया। जिससे वह दाह संस्कार में शामिल नहीं हो सके। मेंहदावल ब्लाॅक के रक्सा निवासी पंडित पाटेश्वरी प्रसाद मिश्र के छह पुत्र थे। इसमें लालसा प्रसाद मिश्र सबसे बड़े थे। 14 वर्ष की उम्र से ही वह आजादी के आंदोलन से जुड़ गए थे। वर्ष 1941 में गोरखपुर जिले के डोहरिया में ट्रेन लूटने की घटना का नेतृत्व करने के कारण अंग्रेजों ने उन्हें जिंदा अथवा मुर्दा पकड़ने का फरमान जारी किया था। वर्ष 1946 में उनके बुलावे पर मेंहदावल आए पंडित जवाहरलाल नेहरु ने क्रांतिकारियों की सभा को संबोधित किया था। 1930 में जेल से छूटने के बाद लालसा प्रसाद मिश्र के साथ उनके भाई श्यामलाल मिश्र और बंशराज भी शामिल हो गए थे। 1932 में उन्हें छह माह की कैद के साथ ही सौ रुपये का जुर्माना लगाकर जेल भेज दिया गया। उनके जेल जाने के बाद छोटे भाई श्यामलाल मिश्र ने कमान संभाल ली और वह सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल हुए। उन पर भी सरकार की ओर से छह माह की कैद और 100 रुपये का जुर्माना लगा दिया गया था। मिश्र बंधुओं का मनोबल तोड़ने के लिए अंग्रेजी हुकूमत तमाम प्रयास किए, लेकिन सफल नहीं हो पाए। मिश्र बंधुओं ने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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