संतकबीरनगर। नगर पालिका विदेशी नस्ल के पिटबुल और रॉड विलर जैसे खुंखार कुत्तों पर नकेल कसने की तैयारी तो कर रहा है, मगर गली-गली बच्चों और लोगों को अपना शिकार बना रहे देसी कुत्तों पर किसी की नजर नहीं है। विदेशी से ज्यादा इन दिनों देसी कुत्ते खूंखार होते दिखाई दे रहे हैं। इसका अंदाजा जिला अस्पताल और सीएचसी के रिकार्ड से लगाया जा सकता है। यहां रोजाना 25 की संख्या में लोग एंटी रैबीज वैक्सीन लगवाने पहुंच रहे हैं। इसमें 15 फीसदी संख्या बच्चों की है।
दरअसल उमस भरी गर्मी और बदलते मौसम में कुत्ते खतरनाक हो गए हैं, इसलिए समझदारी इसी में है कि नगर पालिका के भरोसे रहने के बजाय इन दिनों अपना और बच्चों को ख्याल रखें।
शहर और गांव की सड़कों पर रात में अगर निकल रहे हैं, तो थोड़ा सतर्क रहिए। कुत्ते कभी भी हमला कर सकते हैं। अगर बाइक से हैं तो हादसे के शिकार भी हो सकते हैं। बृहस्पतिवार को जिला अस्पताल में नौ लोग और सभी सीएचसी पर 16 लोगों ने एंटी रैबिज इंजेक्शन लगवाया। इसमें पांच बच्चे भी शामिल हैं। दरअसल, शहर की तंग गलियों से लेकर प्रमुख सड़कों पर आवारा कुत्तों ने डेरा जमा लिया है। इनकी संख्या इतनी ज्यादा होती है कि अगर सावधान नहीं रहे तो कुत्ते पीछे लग जाएंगे। अगर इनसे किसी तरह से बचे तो वे आगे की टोली को आवाज देकर संकेत दे देते हैं। फिर झुंड में हमला कर देते हैं। इनके हमलों से कई बार बाइक सवार अनियंत्रित होकर गिर जाते हैं। चोटिल हो जाते हैं।
रविवार की रात में धनघटा के रामजानकी मार्ग पर सोनडीह के पास एक कुत्ते ने एक-एक कर छह लोगों को दौड़ा कर काट लिया।
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ग्रामीण क्षेत्रों में कुत्तों के काटने की शिकायत ज्यादा
जिला अस्पताल के चिकित्सक डॉ. कुमार सिद्धार्थ ने बताया कि कुत्ते ज्यादा आक्रामक हो गए हैं। शहर से मरीज तो आ रहे हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के मरीज ज्यादा हैं। प्रतिदिन जिला अस्पताल में 10 लोग रैबीज लगवा रहे हैं। जिले में प्रतिदिन एंटी रैबीज 25 से अधिक लोगों को लगाई जा रही है। एक वायल में चार लोगों को वैक्सीन लगाई जाती है।
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एआरवी न लगवाने वाले जान पर खेल रहे
जिला अस्पताल के चिकित्सक डॉ. वरुणेश दुबे ने बताया कि मरीज अगर एआरवी नहीं लगवाते हैं, तो जान जोखिम में डाल रहे हैं। कुत्तों के काटने का तत्काल प्रभाव नहीं पड़ता। जैसे-जैसे समय बीतता है, वैसे-वैसे शरीर में संक्रमण बढ़ता जाता है। ऐसे में मरीज के शरीर में क्या परिवर्तन हो जाए, यह किसी को पता नहीं। इसलिए कुत्ते, बंदर और इंसान के काटने पर एआरवी जरूर लगवाएं।
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विदेशी-पालतू कुत्ते जगह न मिलने के कारण हो रहे कटखने
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. एके शाही के मुताबिक, शहर में जो लोग कुत्ते पाले हैं, उन्हें रहने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं मिल पा रहा है। इसके चलते वह ज्यादा चिड़चिड़े हो जाते हैं। इनमें सबसे अधिक दिक्कत रॉट विलर, पिटबुल और बुलडाॅग प्रजाति के कुत्ते शामिल हैं। इन्हें ज्यादा स्थान चाहिए खुद के खेलने-रहने के लिए, लेकिन लोग दो कमरे में रहकर उन्हें भी साथ ही रख रहे हैं।
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ज्यादा गर्मी व खाली पेट से हो रहे हिंसक
गर्मी ज्यादा पड़ रही है। इसकी वजह से कुत्तों के व्यवहार में बदलाव आया है। ऐसे मौसम में कुत्ते ज्यादा आक्रामक हो जाते हैं। क्योंकि कुत्तों के दिमाग में थर्मो रेगलेट्री सिस्टम नहीं होता है। यही कारण है कि अपनी गर्मी को शांत करने के लिए जीभ निकालकर हांफते हैं। इससे महज 10 से 15 प्रतिशत ही गर्मी निकल पाती है। गर्मी के चलते उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है। जरा भी आवाज सुनने पर आक्रामक होकर लोगों को काट लेते हैं। दूसरी बड़ी वजह यह भी है कि इनके रहने की जगह भी कम होती जा रही है। हर तरफ मकान बन गए हैं और जो जगह बच रही है वहां गाड़ियों का कब्जा हो गया है। इसकी वजह से इन्हें डर है कि एक दिन इस स्थान से भी भगा दिए जाएंगे। एक और कारण है, पहले घरों के आसपास इन्हें खाने के लिए पर्याप्त मात्रा में जूठन मिल जाता था। सफाई को लेकर लोग जागरूक हुए, तो अब खाने को भी नहीं मिल पा रहा है। खाली पेट होने के चलते भी गुस्सा बढ़ा है।
- डॉ. एके शाही, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी
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हाई डोज एंटी रैबीज वैक्सीन उपलब्ध
जिन लोगों को कुत्ते गंभीर रूप से काट लेते हैं, उन्हें हाई डोज एंटी रैबीज वैक्सीन लगाई जाती है। यह इंजेक्शन कंधे के बजाए मरीज के जख्म पर लगाई जाती है। हाई डोज वैक्सीन जिला अस्पताल के अलावा सीएचसी पर उपलब्ध है। निजी अस्पतालों में इस वैक्सीन लगवाने के लिए लोगों को 1500 से दो हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं। यह सिर्फ गोरखपुर के निजी अस्पताल में लगाई जाती है। सीएचसी खलीलाबाद के अधीक्षक डॉ. राधेश्याम यादव ने बताया कि सीएचसी पर हाईडोज वैक्सीन लगाई जाती है। यहां मरीज को तिथि के अनुसार तीन से पांच डोज लगती है।
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एक सप्ताह में जिला अस्पताल और सीएचसी पर एआरवी लगवाने पहुंचे मरीज
30 जून- 18 - पांच बच्चे
एक जुलाई- 17- तीन बच्चे
दो जुलाई- 16 - एक बच्चा
तीन जुलाई- 22- तीन बच्चे
चार जुलाई- 19- दो बच्चे
पांच जुलाई- 24- चार बच्चे