संतकबीरनगर। सरकारी अस्पतालों में सुरक्षित प्रसव को बढ़ावा देने की योजना जिले में हवा-हवाई साबित हो रही है। तमाम कोशिशों के बावजूद प्राइवेट नर्सिंगहोम का तिलिस्म नहीं टूट रहा है। विभागीय लापरवाही से एक साल में 36,565 महिलाओं का प्रसव प्राइवेट अस्पतालों में हुआ है। शासन को भेजी गई रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। गांवों में आशा, एएनएम की तैनाती के बाद भी सरकारी अस्पतालों तक गर्भवती का न पहुंचना सिस्टम पर सवाल खड़ा कर रहा है।
जननी सुरक्षा योजना के तहत सुरक्षित प्रसव करने पर शासन का जोर है। सरकारी अस्पतालों में इसके लिए बेहतर इंतजाम किए गए हैं। प्रसूताओं को प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है। इसके बावजूद सरकारी अस्पतालों में लक्ष्य के सापेक्ष प्रसव नहीं हो रहा है। स्वास्थ्य विभाग को वर्ष 2022-23 में 63009 प्रसव कराने का लक्ष्य मिला था, लेकिन सरकारी अस्पतालों में 26,444 प्रसव हुए। इसमें 36,565 प्रसव प्राइवेट अस्पतालों में हुए। कमीशन के चक्कर में प्राइवेट अस्पतालों में गर्भवतियों को पहुंचाने और सीएचसी, पीएचसी पर प्रसव कराने में उदासीनता बरतने वाली 25 आशाओं को नोटिस भी दिया गया, लेकिन अफसरों ने मामले को दबा दिया।
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ब्लॉक वार प्रसव की स्थिति
ब्लॉक - लक्ष्य - प्रसव सरकारी अस्पताल में
खलीलाबाद- 7499 - 3310
मेंहदावल- 5920 - 3588
हैंसर- 7635 - 2632
सेमरियावां - 8913 -5741
नाथनगर - 7440 -2638
बघौली- 7795 -2148
सांथा - 5573 -2600
पौली - 3941 -1480
बेलहर कला- 4328 -1004
जिला अस्पताल- 3965 -1303
छह ब्लॉक को मिला है पांच हजार से अधिक का लक्ष्य
जिले में सात सीएचसी और 22 पीएचसी संचालित हैं। इसके साथ ही 42 जननी सुरक्षा केंद्र हैं। सभी स्थानों पर प्रसव की सुविधा है। इसके बावजूद यहां गर्भवती क्यों नहीं पहुंचती हैं, यह बड़ा सवाल है। सेमरियावां, खलीलाबाद छोड़ दिया जाए तो अधिकांश सीएचसी पर सिर्फ नाम का प्रसव हुआ है। जिले में 1957 आशा कार्यकर्ता हैं, जिसमें काम में लापरवाही पर 25 आशाओं को नोटिस भी जारी हुआ है।
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एसएनसीयू में भर्ती हैं 22 नवजात
जिला अस्पताल में 18 बेड की क्षमता का एसएनसीयू वार्ड है। जहां नवजातों को भर्ती किया जाता है। इसमें फीवर, झटके, पीलिया और कम वजन वाले अधिकांश बच्चे हैं। कुल 22 बच्चे भर्ती हैं और इसमें नौ बच्चे तो सिर्फ नर्सिंगहोम से आए हैं। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. डीपी सिंह का कहना है कि कोई भी नवजात को लेकर आता है तो उसको भर्ती कर इलाज देना प्राथमिकता है। जो भी बच्चे आते हैं उनका इलाज किया जाता है।
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केस एक
अस्पताल संचालक ने खुद कर दिया था ऑपरेशन
दो साल पूर्व सरैया बाईपास के पास नर्सिंगहोम में डॉक्टर के न पहुंचने पर अस्पताल संचालक ने खुद ऑपरेशन कर दिया था, जिसके बाद महिला की मौत हो गई थी। गांव वालों ने अस्पताल संचालक की पिटाई भी की थी। बाद में मामला लेनदेन के बाद शांत हो गया था।
केस दो
एक साल पहले मेंहदावल एसडीएम ने कस्बे में छापा मारा था, जहां नर्सिंगहोम में प्रसूता गई थी। प्रसव के दौरान उसकी मौत हो गई थी, उसके बाद नर्सिंगहोम को सील कर दिया गया था। बाद में यह भी मामला शांत हो गया।
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आशाओं को किया जा रहा चिह्नित
सभी आशा व एएनएम को सरकारी अस्पताल में प्रसव कराने का निर्देश दिया गया है, अगर इसमें लापरवाही बरती जा रही है तो जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। वैसे आशा कार्यकर्ता के कार्यों की समीक्षा की जा रही है, यह देखा जा रहा है कि कौन सी आशा नसबंदी, टीकाकरण और प्रसव कराने में रुचि नहीं दिखा रही है, उन पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
-डॉ अनिरूद्ध सिंह, सीएमओ