-जन्म के बाद न राेने वाले नवजात की संख्या बढ़ी
- जिला अस्पताल के एनआईसीयू में चल रहा नवजात का इलाज
- 18 बेड के एनआईसीयू में 24 नवजात है भर्ती
संवाद न्यूज एजेंसी
संतकबीरनगर। जन्म के बाद न रोने वाले नवजातों की संख्या बढ़ रही है। इसे मेडिकल साइंस की भाषा में न्यूनेटेल एसफिक्सिया कहा जाता है। जिला अस्पताल के एनआईसीयू (नवजात गहन चिकित्सा इकाई) में ऐसे बच्चों का इलाज चल रहा है। 18 बेड के एनआईसीयू में कुल 24 नवजात भर्ती है। चिकित्सकों का कहना है कि समय से पहले हो रहे प्रसव के मामले बढ़ने से ऐसे नवजातों की संख्या बढ़ रही है।
जिला अस्पताल में दूर दराज से मरीज इलाज कराने आते हैं। इनमें गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं। हर रोज करीब 100 से 120 गर्भवती महिलाएं ओपीडी में इलाज कराती हैं।
इनसेट
क्या है ''न्यूनेटेल एसफिक्सिया''
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ सुनील कुमार का कहना है कि मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी के चलते बीमार नवजातों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस स्थिति को ''न्यूनेटेल एसफिक्सिया'' भी कहा जाता है। इसे हाई रिस्क भी कहा जा सकता है। यह समस्या शिशु को जन्म के तुरंत बाद होती है। इस स्थिति में शिशु के मस्तिष्क के ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती है। और सांस लेने में तकलीफ होती है। उन्होंने बताया कि इससे शरीर में एसिड का स्तर बढ़ जाता है। यह स्थिति जानलेवा हो सकती है। ऐसा ज्यादातर समय से पहले प्रसव होने पर होता है।
ऐसे में बच्चा जन्म के बाद बिलकुल भी नहीं रोता है। आमतौर पर जन्म के बाद न रोने वाले शिशु की पीठ और कमर के आस पास थपकी देकर या उसे उल्टा कर दिया जाता है ताकि बच्चा रोए। लेकिन ऐसी हालत में बच्चा इस पर भी प्रतिक्रिया नहीं करता है। भर्ती होने वाले अधिकांश बच्चों का वजन सात-आठ सौ ग्राम के आस पास होता है। डाॅ सुनील कुमार का कहना है कि 37 सप्ताह से पहले बच्चे के फेंफडे पूरी तरह से विकसित नहीं होते हैं। ऐसे में इस अवधि से पहले प्रसव हो जाए तो शिशु को सांस लेने में दिक्कत होती है। इससे भी बच्चा रो नहीं पाता है।
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पैदा होने के बाद से नहीं रो रहा बच्चा
एनआईसीयू में नवजात को लेकर पहुंचे सुरेंद्र का कहना कि उनकी पत्नी को तीन दिन पूर्व बच्ची हुई है। लेकिन वह शांत रहती है। इसे दिखाने आए हैं। इसी तरह से संगीता भी नवजात को लेकर पहुंची थी। उनका कहना था कि बच्चा चार दिन पूर्व पैदा हुआ है और उस समय तो खूब रोया। लेकिन अब शांत रहता है। कुछ भी पी नहीं रहा है। डॉ सुनील कुमार ने नवजात को भर्ती कर इलाज शुरू किया।
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न रोने वाले बच्चों के यह है लक्षण
- शिशु की त्वचा का रंगत असामान्य होना।
- प्रसव के बाद शिशु का शांत होना या न राेना।
- ह्दय गति कम होना, सांस लेने में दिक्कत।
- दौरे पड़ना, बच्चे का सुस्त होना।
- खुून का दबाव कम होना।
- पेशाब कम होना, रक्त के धक्के जमना।
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गर्भावस्था में रखें ध्यान
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ सुनील कुमार ने बताया कि न रोने वाले बच्चों की संख्या बढ़ रही है। कई शिशुओं की हालत काफी खराब होती है। ऐसे बच्चों को 15 से 25 दिन तक भर्ती करना पड़ता है। अधिकांश केस में बच्चा जन्म के बाद रो नहीं रहा। इसके पीछे गर्भावस्था के दौरान ठीके से देखभाल न करना, जंक फूड, फास्ट फूड अधिक खाना, अच्छे खानपान में कमी और समय पर डॉक्टर से चेकअप न कराना भी शिशु के लिए मुश्किलें पैदा करता है।