संवाद न्यूज एजेंसी
मगहर। बुधवार को मोहर्रम का चांद दिखा तो ताजियेदारों ने तैयारी शुरू कर दी। इस्लाम धर्म के अनुसार नए साल की शुरुआत अरबी महीने मोहर्रम के महीने से होती है। इसी महीने में पैगंबर मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन व हसन सहित 72 लोगों की शहादत हुई थी। इमाम हुसैन की याद में मुस्लिम समाज के लोग हर साल मोहर्रम का जुलूस निकालते हैं। मोहर्रम पर मुसलमान खास तौर पर शिया मुसलमान पैगंबर मोहम्मद के नवासे की शहादत का गम मनाते हैं। साथ ही घरों में मजलिसें सजाते हैं।
ताजियादार सिराज अहमद खान,अब्दुल नबी, मुन्नू खान ने बताया कि इस साल मोहर्रम पर ताजियों के जुलूस को लेकर तैयारियां शुरू हो गयी हैं। मुस्लिम कौम के लोग अलग-अलग इलाकों में विभिन्न रंगों से सुसज्जित ताजियों का निर्माण करने में जुटे हैं। नगर के विभिन्न मुहल्लों शेरपुर,चूड़ी फरोश,अनजान शहीद आदि जगहों पर कारीगरों की मदद से दिन-रात एक करके मेहनत और लगन के साथ खूबसूरत ताजियों का निर्माण किया जा रहा है। कहीं पर थर्माकोल पेपर तो कहीं रंगीन पेपरों की कटिंग कर सजावटी सामान से नक्काशीनुमा कर विभिन्न प्रकार की डिजाइनें बनाई जा रही हैं। यह त्योहार नगर ही नहीं आसपास के क्षेत्रों कोडरी, गड्सरपार, भरपुरवा,धौरहरा आदि गांवों में अकीदत के साथ मनाया जाता है। यहां भी तजियादार ताजिया बनाने में मशगूल हो गये हैं।
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मोहर्रम का महीना गम का महीना होता है
इतिहास के अनुसार सन 61 हिजरी (680 ईस्वी) में इराक में स्थित कर्बला की सरजमीं पर हजरत पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम के नवासे हजरत इमाम हुसैन को उनके दीगर 72 साथियों के साथ शहीद कर दिया गया था। मुसलमान भाई मोहर्रम महीने में हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का गम मनाते हैं। शिया समुदाय के लोग मजलिसें सजाते हैं। मातम करते हैं और उनकी शहादत पर अफसोस जाहिर करते हैं। साथ ही गिरिया (रोना) करते हैं। क्योंकि इसी महीने में पैगंबर मोहम्मद के नवासे की शहादत हुई थी। इसीलिए इस महीने को गम का महीना कहा जाता है।